News Saga Desk
दिल्ली की हवा एक बार फिर गंभीर रूप से प्रदूषित हो चुकी है। सर्दियों के साथ ही स्मॉग, आंखों में जलन और सांस लेने में परेशानी आम हो गई है। इसी बीच चीन ने अपने अनुभव साझा करते हुए वायु प्रदूषण से निपटने के लिए तथाकथित ‘बीजिंग मॉडल’ का हवाला दिया है और भारत के सामने कुछ अहम उदाहरण रखे हैं।
दिल्ली-एनसीआर में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार, मंगलवार सुबह दिल्ली का औसत AQI 378 दर्ज किया गया, जो ‘बहुत खराब’ श्रेणी में आता है। इससे एक दिन पहले कई इलाकों में AQI 400 के पार चला गया था। इंडिया गेट, सराय काले खां सहित कई क्षेत्रों में जहरीला स्मॉग छाया रहा, जिससे जनजीवन प्रभावित हुआ।
इन्हीं हालात के बीच भारत में चीन के दूतावास की प्रवक्ता यू जिंग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर बताया कि तेज शहरीकरण के कारण भारत और चीन दोनों को वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या का सामना करना पड़ा। हालांकि, बीते एक दशक में चीन ने निरंतर प्रयासों के जरिए इस चुनौती पर काफी हद तक काबू पाया है। उन्होंने कहा कि वह एक श्रृंखला के माध्यम से बताएंगी कि चीन ने प्रदूषण को कैसे नियंत्रित किया, जिसकी शुरुआत बीजिंग के उदाहरण से हुई है।
बीजिंग मॉडल: प्रदूषण से लड़ने के 6 बड़े कदम
चीन ने सबसे पहले वाहनों से होने वाले प्रदूषण पर सख्ती की। इसके तहत यूरोप के यूरो-6 के समान कड़े ‘चीन-6’ उत्सर्जन मानक लागू किए गए। पुराने और ज्यादा धुआं छोड़ने वाले वाहनों को सड़कों से हटाया गया। निजी वाहनों की संख्या नियंत्रित करने के लिए लाइसेंस प्लेट लॉटरी, ऑड-ईवन और वीकडे ड्राइविंग जैसे नियम लागू किए गए।
लोगों को निजी गाड़ियों से हटाकर सार्वजनिक परिवहन की ओर लाने के लिए बीजिंग में दुनिया के सबसे बड़े मेट्रो और बस नेटवर्क का विस्तार किया गया। इलेक्ट्रिक वाहनों को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया गया और बीजिंग-तियानजिन-हेबेई क्षेत्र के साथ मिलकर क्षेत्रीय स्तर पर प्रदूषण कम करने की रणनीति अपनाई गई।
2008 से शुरू हुआ बदलाव का सफर
बीजिंग में प्रदूषण से लड़ाई की शुरुआत 2008 ओलंपिक से पहले हुई, जब हालात बेहद खराब हो चुके थे। सरकार ने निगरानी बढ़ाई, नियमित एयर क्वालिटी रिपोर्ट जारी की और जनता में जागरूकता लाई। 2013 में सरकार ने आधिकारिक तौर पर माना कि प्रदूषण ‘गंभीर’ स्तर पर है, जिसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर एक्शन प्लान लागू किया गया और PM2.5 को कम करने के लिए कानूनी लक्ष्य तय किए गए।
2013-2017 का एक्शन प्लान
इस अवधि में परिवहन, उद्योग और कोयले पर विशेष ध्यान दिया गया। सार्वजनिक परिवहन को इलेक्ट्रिक बनाने की दिशा में बड़े कदम उठाए गए। शेनझेन दुनिया का पहला ऐसा शहर बना, जहां पूरी बस सेवा इलेक्ट्रिक हुई। डीजल ट्रकों पर सख्त पाबंदियां लगीं, पुराने उद्योग बंद किए गए या उनका आधुनिकीकरण किया गया। कोयले की जगह गैस और नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा दिया गया।
चीन ने साफ हवा के लिए भारी निवेश किया। 2013 में जहां इस पर करीब 45 करोड़ डॉलर खर्च हुए थे, वहीं 2017 तक यह राशि बढ़कर 2.5 अरब डॉलर से ज्यादा हो गई। इसका असर यह हुआ कि भारी प्रदूषण वाले दिनों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आई।
भारत के लिए क्या संदेश?
चीन का दावा है कि 2013 के बाद से बीजिंग में PM2.5 का स्तर 60 प्रतिशत से अधिक घटा है। विशेषज्ञों का मानना है कि सख्त कानून, कड़ा अमल और क्षेत्रीय सहयोग ही इस सफलता की कुंजी रहे हैं। भारत के लिए यह मॉडल सीख देता है कि प्रदूषण से निपटने के लिए तात्कालिक उपायों से आगे बढ़कर लंबी और निरंतर रणनीति अपनानी होगी। सवाल यही है कि क्या भारत भी बीजिंग की तरह इस लड़ाई को लंबे समय तक पूरी गंभीरता से लड़ने को तैयार है।
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