बाघा जतिन की पुण्यतिथि पर CM शुभेंदु अधिकारी ने दी श्रद्धांजलि

बाघा जतिन की पुण्यतिथि पर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने श्रद्धांजलि दी। जानें जतिंद्रनाथ मुखर्जी के जीवन, संघर्ष और बलिदान की कहानी।

News Saga Desk

कोलकाता। महान क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी बाघा जतिन की पुण्यतिथि पर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। 10 सितंबर को देशभर में महान क्रांतिकारी जतिंद्रनाथ मुखर्जी को उनके साहस, देशभक्ति और ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष के लिए याद किया जाता है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने समाज माध्यम पर पोस्ट कर बाघा जतिन के आत्मबलिदान को नमन किया और उनके योगदान को स्मरण किया।

मुख्यमंत्री ने अपने संदेश में लिखा, “सशस्त्र क्रांतिकारी, स्वतंत्रता सेनानी बाघा जतिन, जतिंद्रनाथ मुखर्जी के आत्मबलिदान दिवस पर विनम्र श्रद्धांजलि।” उनके इस संदेश के बाद एक बार फिर बंगाल के स्वतंत्रता आंदोलन में बाघा जतिन की भूमिका और उनके अदम्य साहस की चर्चा तेज हो गई है।

कौन थे बाघा जतिन?

बाघा जतिन का वास्तविक नाम जतिंद्रनाथ मुखर्जी था। उनका जन्म 7 दिसंबर 1879 को तत्कालीन बंगाल में हुआ था। वे उन क्रांतिकारियों में शामिल थे, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष को स्वतंत्रता प्राप्ति का महत्वपूर्ण माध्यम माना। वे युगांतर से जुड़े प्रमुख क्रांतिकारियों में रहे और युवाओं को देश की आजादी के लिए संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

बाघा जतिन नाम उन्हें एक बेहद साहसिक घटना के बाद मिला। कहा जाता है कि उन्होंने बिना किसी आधुनिक हथियार के एक बाघ का सामना कर उसे मार गिराया था। इस असाधारण साहस के कारण जतिंद्रनाथ मुखर्जी को ‘बाघा जतिन’ के नाम से पहचान मिली। पश्चिम बंगाल सरकार के ऐतिहासिक अभिलेखों में भी उनके इसी साहसिक प्रसंग का उल्लेख मिलता है।

ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र आंदोलन

बाघा जतिन केवल व्यक्तिगत बहादुरी के लिए ही प्रसिद्ध नहीं थे, बल्कि वे संगठित क्रांतिकारी आंदोलन के प्रमुख चेहरों में भी शामिल थे। उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष को मजबूत करने की दिशा में काम किया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने विदेशी सहायता के माध्यम से ब्रिटिश शासन के खिलाफ बड़े विद्रोह की योजना बनाने का प्रयास किया था।

बाघा जतिन

भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव से जुड़े अभिलेखों के अनुसार, 1915 में बाघा जतिन और उनके साथियों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह की योजना बनाई थी। हालांकि यह योजना सफल नहीं हो सकी और ब्रिटिश पुलिस को इसकी जानकारी मिल गई।

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बालासोर में हुआ निर्णायक संघर्ष

9 सितंबर 1915 को ओडिशा के बालासोर में ब्रिटिश पुलिस और बाघा जतिन के साथियों के बीच भीषण मुठभेड़ हुई। यह संघर्ष चाशाखंड क्षेत्र में हुआ, जहां क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश पुलिस का सामना किया। बाघा जतिन इस मुठभेड़ में गंभीर रूप से घायल हो गए थे।

सरकारी ऐतिहासिक रिकॉर्ड के मुताबिक, बाघा जतिन और उनके साथियों ने भारी संख्या में मौजूद पुलिस बल का मुकाबला किया। मुठभेड़ में उनके साथी चित्तप्रिय राय चौधरी की मौत हो गई, जबकि जतिन गंभीर रूप से घायल हुए। बाद में उन्हें बालासोर के अस्पताल ले जाया गया।

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