News Saga Desk
अदालत ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट कर दिया है कि यदि बुजुर्ग माता-पिता को मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा हो, तो उनके स्व-अर्जित मकान में बेटा और बहू जबरन नहीं रह सकते।
न्यायमूर्ति राजेश कुमार की अदालत ने रामगढ़ उपायुक्त द्वारा 23 फरवरी 2024 को पारित आदेश को रद्द करते हुए बुजुर्ग दंपति की याचिका स्वीकार कर ली। अदालत ने कहा कि संबंधित संपत्ति वरिष्ठ नागरिकों की स्वयं अर्जित है और केवल उत्तराधिकारी होने से किसी को तत्काल स्वामित्व का अधिकार नहीं मिल जाता।
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि कानून का उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों को सुरक्षित, सम्मानजनक और शांतिपूर्ण जीवन देना है। यदि पारिवारिक हालात ऐसे बन जाएं कि साथ रहना संभव न हो और दुर्व्यवहार की स्थिति उत्पन्न हो, तो संपत्ति का संरक्षण बुजुर्गों के पक्ष में किया जाना चाहिए।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जीवन के अंतिम चरण में बुजुर्गों को गरिमा, सुरक्षा और मानसिक शांति मिलना उनका मौलिक अधिकार है।
क्या है पूरा मामला?
रामगढ़ जिला निवासी 75 वर्षीय लखन लाल पोद्दार और उनकी 72 वर्षीय पत्नी उमा रानी पोद्दार ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। दंपति का आरोप था कि उनके बेटे जितेन्द्र पोद्दार और बहू रितु पोद्दार उन्हें प्रताड़ित करते हैं और घर में शांतिपूर्वक रहने नहीं देते।
वर्ष 2022 में दंपति ने मेंटेनेंस अधिनियम के तहत एसडीएम के समक्ष आवेदन दिया था। 23 नवंबर 2022 को एसडीएम ने बेटे-बहू को मकान खाली करने का आदेश दिया। इसके बाद बेटे-बहू ने अपील की, जिस पर रामगढ़ उपायुक्त ने 23 फरवरी 2024 को एसडीएम के आदेश में संशोधन करते हुए उनके पक्ष में निर्णय दे दिया।
इस आदेश को चुनौती देते हुए बुजुर्ग दंपति दोबारा हाईकोर्ट पहुंचे। सुनवाई के बाद अदालत ने उपायुक्त के आदेश को निरस्त कर वरिष्ठ नागरिकों के पक्ष में अंतिम फैसला सुनाया।
यह निर्णय उन बुजुर्गों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, जो अपनी ही संपत्ति में असुरक्षित महसूस करते हैं।
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