News Saga Desk
पश्चिम चंपारण (बगहा)। बिहार के एकमात्र टाइगर रिजर्व वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना (VTR) में बाघों की संख्या के सटीक आकलन के लिए आधुनिक तकनीक का सहारा लिया जा रहा है। आगामी राष्ट्रीय बाघ गणना 2026 को लेकर वन विभाग की तैयारियां तेज हो गई हैं। अब तक मिट्टी में पंजों के निशान के आधार पर की जाने वाली पारंपरिक ट्रैकिंग पद्धति के बजाय कैमरा ट्रैप और मोबाइल एप के माध्यम से बाघों की गणना की जा रही है।
वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों को एम-स्ट्राइप (M-STrIPES) नामक मोबाइल एप को संचालित करने का विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है। यह एप जीपीएस आधारित है और जंगल में गश्त के दौरान बाघों की गतिविधियों से जुड़े डेटा को रिकॉर्ड करता है। दिनभर के सर्वेक्षण के बाद यह डेटा टाइगर सेल में सुरक्षित किया जाता है।
बाघों के आवागमन वाले मार्गों पर दोनों ओर कैमरा ट्रैप लगाए जा रहे हैं। जैसे ही बाघ इन रास्तों से गुजरते हैं, उनकी तस्वीरें स्वतः कैमरों में कैद हो जाती हैं। इसके बाद बाघों के शरीर पर मौजूद धारियों के पैटर्न का मिलान कर उनकी पहचान की जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, बाघों की धारियां इंसानों के फिंगरप्रिंट की तरह अद्वितीय होती हैं, जिससे प्रत्येक बाघ की सटीक पहचान संभव होती है।
करीब 900 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले वीटीआर में बाघों की संख्या में पिछले वर्षों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2000–01 में यहां लगभग 30 बाघ थे, जो 2005–06 में घटकर 18 रह गए। 2010 में यह संख्या और गिरकर केवल 8 रह गई थी। हालांकि 2014 की गणना के बाद हालात बदले और बाघों की संख्या बढ़कर 28 हो गई। 2018 में यह आंकड़ा 35 तक पहुंचा, जबकि 2022 की गणना में वीटीआर में 54 बाघ पाए गए।
वन विभाग के अनुसार, बाघों की वास्तविक और अंतिम संख्या की औपचारिक घोषणा देहरादून से की जाएगी। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) द्वारा हर चार साल में ऑल इंडिया टाइगर एस्टिमेशन कराया जाता है, जिसका उद्देश्य देशभर में बाघों की संख्या, उनके आवास क्षेत्र, वितरण और संरक्षण की स्थिति का वैज्ञानिक आकलन करना है।
सीएफ नेशमणि ने बताया कि इस राष्ट्रीय अभियान में भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) की भूमिका अहम है। संस्थान द्वारा वनकर्मियों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया है, ताकि गणना पूरी तरह वैज्ञानिक, पारदर्शी और विश्वसनीय तरीके से संपन्न हो सके। फील्ड बायोलॉजिस्ट सौरभ वर्मा के अनुसार, कैमरा ट्रैप तकनीक वर्तमान समय में बाघ गणना की सबसे भरोसेमंद विधि मानी जाती है।
इस वैज्ञानिक प्रक्रिया से न केवल बाघों की वास्तविक संख्या का पता चलेगा, बल्कि उनके मूवमेंट पैटर्न, क्षेत्रीय विस्तार और व्यवहार से जुड़ा महत्वपूर्ण डेटा भी मिलेगा। यह जानकारी भविष्य में बाघ संरक्षण की रणनीति तैयार करने, वन प्रबंधन को मजबूत करने और मानव–वन्यजीव संघर्ष को कम करने में मददगार साबित होगी। इस मौके पर पंकज ओझा और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के अहवर आलम भी उपस्थित रहे।
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