News Saga Desk
बिहार विधानसभा चुनाव में करारी हार झेलने के बाद कांग्रेस ने सोमवार को सदाकत आश्रम में एक अहम समीक्षा बैठक बुलाई थी। उद्देश्य था—हार के कारणों की पहचान, संगठन की कमजोरियों का आकलन और 2025 की तैयारी के लिए रणनीति तय करना। लेकिन जिस सक्रियता और एकजुटता की उम्मीद की जा रही थी, वह बैठक में नजर नहीं आई। कांग्रेस के 15 जिलाध्यक्ष बैठक में पहुंचे ही नहीं, जिससे पार्टी हाईकमान की भौहें तन गई हैं।
गैरहाजिर जिलाध्यक्षों पर सख्ती-अनुशासनहीनता का नोटिस जारी
बैठक से अनुपस्थित रहने को प्रदेश नेतृत्व ने सीधे तौर पर ‘‘अनुशासनहीनता’’ माना है। कांग्रेस ने सभी 15 जिलाध्यक्षों को नोटिस जारी करते हुए 7 दिनों के भीतर लिखित जवाब देने को कहा है—वे बैठक जैसे महत्वपूर्ण आयोजन में क्यों नहीं पहुंचे?
यह कदम संकेत देता है कि चुनावी हार के बाद भी कांग्रेस के जमीनी ढांचे में सक्रियता की कमी बनी हुई है।
कौन-कौन नहीं पहुंचे बैठक में?
जिन जिलों के जिलाध्यक्ष गैरहाजिर रहे, उनमें शामिल हैं:
पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, अररिया, मधुबनी, कटिहार, सुपौल, भागलपुर, जमुई, बक्सर, गया, लखीसराय, मुंगेर, शेखपुरा सहित कुल 15 जिले।
प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम और बिहार प्रभारी कृष्णा अल्लावरु ने बैठक में साफ कहा कि संगठन को पुनर्जीवित करना है तो अनुशासन, उपस्थिति और सक्रियता अनिवार्य है।
43 नेताओं पर भी कार्रवाई की तलवार
समीक्षा बैठक में यह भी खुलासा हुआ कि चुनाव के दौरान 43 नेताओं पर पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप लगे थे। प्रदेश नेतृत्व ने इन पर कार्रवाई के लिए हाईकमान से अनुमति मांगी है।
कांग्रेस का साफ संदेश है—अब पार्टी विरोध, निष्क्रियता और लापरवाही पर कोई ढिलाई नहीं मिलेगी।
क्या कांग्रेस का जमीनी ढांचा टूट चुका है?
बार-बार चुनावी हार और नेतृत्व की सक्रियता की अपील के बावजूद 15 जिलाध्यक्षों का बैठक से गायब रहना कई सवाल खड़े करता है।
क्या कांग्रेस का जिला व ब्लॉक स्तर पर ढांचा कमजोर हो चुका है?
क्या नेताओं में चुनावी हार को लेकर गंभीरता खत्म हो रही है?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कांग्रेस अपने जमीनी कैडर को समय रहते सक्रिय नहीं कर पाती, तो 2025 में बिहार में पुनरुत्थान का रास्ता और कठिन हो जाएगा।
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