धनबाद में झामुमो का 53वां स्थापना दिवस: गुरुजी के बिना पहली बार सजेगा ऐतिहासिक मंच

News Saga Desk

धनबाद से ही झारखंड मुक्ति मोर्चा के संघर्ष की शुरुआत हुई थी और अब उसी धरती पर पार्टी अपना 53वां स्थापना दिवस मनाने जा रही है। चार फरवरी को झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) अपने 53वें स्थापना दिवस के अवसर पर एक बड़ी सभा का आयोजन करने जा रहा है। यह आयोजन कई मायनों में ऐतिहासिक और भावनात्मक होगा। पहली बार पार्टी के स्थापना दिवस समारोह में दिशोम गुरु शिबू सोरेन शारीरिक रूप से मौजूद नहीं होंगे। मंच पर उनकी तस्वीर रखी जाएगी और उनके सम्मान में एक खाली कुर्सी होगी, जो गुरुजी की अनुपस्थिति के बावजूद उनकी मौजूदगी और योगदान का एहसास कराएगी।

यह दिन इसलिए भी खास है क्योंकि चार फरवरी 1973 को धनबाद में ही झामुमो ने अपना पहला स्थापना दिवस मनाया था। 53 वर्षों के लंबे राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष के सफर में यह क्षण पार्टी के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ के रूप में देखा जा रहा है।

गुरुजी का सपना आज भी पार्टी की आत्मा

भले ही गुरुजी मंच पर न हों, लेकिन उनका सपना, विजन और संघर्ष आज भी झामुमो की राजनीति की आत्मा बना हुआ है। जल, जंगल और जमीन का मुद्दा आज भी पार्टी की विचारधारा के केंद्र में है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में झामुमो उसी रास्ते पर आगे बढ़ रही है, जिसे शिबू सोरेन ने तय किया था। नीतियों में निरंतरता बनी हुई है, हालांकि समय के साथ कार्यशैली में बदलाव हुआ है। यही बदलाव आज की राजनीति की जरूरत भी माना जा रहा है, जिसके बल पर झामुमो राष्ट्रीय दलों को सीधी चुनौती दे पा रही है।

संघर्ष, शहादत और जेल से बनी पहचान

झामुमो का 53 साल का इतिहास संघर्ष, शहादत और त्याग से भरा रहा है। इस दौरान सैकड़ों कार्यकर्ता और नेता आंदोलन में शहीद हुए, कईयों ने पुलिस की लाठियां खाईं और जेल गए, लेकिन संघर्ष का रास्ता नहीं छोड़ा। जुनूनी और संघर्षशील कार्यकर्ता ही पार्टी की असली ताकत रहे हैं। शिबू सोरेन ने अपने साथियों के साथ संगठन को गांव-गांव तक पहुंचाया और एक ऐसे आंदोलन की नींव रखी, जो जनसंघर्ष से सत्ता तक का सफर तय करने में सफल रहा। आज झामुमो सत्ता में है, लेकिन उसकी जड़ें अब भी गांव और आंदोलन से जुड़ी हैं।

संसाधनों की कमी से सबसे बड़े दल तक

एक समय ऐसा भी था जब झामुमो को एक-एक विधायक और सांसद के लिए संघर्ष करना पड़ता था। संसाधनों की भारी कमी थी। शुरुआती दौर में डंडे में पत्ता बांधकर या हाथ से लिखे पर्चों के जरिए सभाओं और जुलूसों की सूचना दी जाती थी। मौखिक आदेशों और फैसलों पर संगठन चलता था। आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। झामुमो के पास राज्य में सबसे ज्यादा विधायक हैं और पार्टी संगठनात्मक व राजनीतिक रूप से पहले से कहीं अधिक मजबूत स्थिति में है।

तकनीक से लैस हुआ नया झामुमो

समय के साथ झामुमो ने खुद को तकनीकी रूप से भी मजबूत किया है। आज पार्टी के पास अपनी मीडिया, सोशल मीडिया, जनसंपर्क और प्रबंधन की अलग-अलग टीमें हैं, जो आधुनिक तकनीक से लैस हैं। अधिकांश कार्यालय कंप्यूटर और डाटा नेटवर्क से जुड़े हुए हैं। पार्टी कार्यक्रमों और फैसलों की जानकारी मिनटों में व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म के जरिए कार्यकर्ताओं और नेताओं तक पहुंच जाती है। वीडियो और रील भी तुरंत साझा की जाती हैं, जो आधुनिक राजनीति में झामुमो की तैयारियों को दर्शाती हैं।

हेमंत सोरेन का नेतृत्व और चुनावी सफलता

करीब एक वर्ष पहले हेमंत सोरेन ने पार्टी का आधिकारिक नेतृत्व संभाला है, हालांकि इससे पहले भी वे चुनावी रणनीतियों की अहम भूमिका निभाते रहे हैं। आधुनिक तकनीक और डेटा आधारित रणनीति के जरिए झामुमो ने हाल के चुनावों में उल्लेखनीय सफलता हासिल की। अब पार्टी केवल झारखंड आंदोलन तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह जानती है कि समय के अनुसार निर्णय कैसे लेने हैं और अपने जनाधार को कैसे विस्तार देना है।

कल्पना सोरेन से मिली नई राजनीतिक ऊर्जा

पिछले कुछ वर्षों में कल्पना सोरेन के राजनीति में सक्रिय होने से पार्टी को नई ऊर्जा मिली है। एक समय झामुमो के पास ऐसे चेहरे कम थे, जो राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूती से पार्टी का पक्ष रख सकें। कल्पना सोरेन ने इस कमी को काफी हद तक पूरा किया है। उनके सक्रिय होने से न सिर्फ हेमंत सोरेन, बल्कि पूरी पार्टी की राजनीतिक ताकत में इजाफा हुआ है। अब देश-दुनिया की घटनाओं पर झामुमो की प्रतिक्रिया मिनटों में सामने आ रही है।

झारखंड से बाहर विस्तार की रणनीति

झामुमो की नजर अब सिर्फ झारखंड तक सीमित नहीं है। ओडिशा, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और असम जैसे राज्यों में आदिवासी आबादी की अच्छी-खासी मौजूदगी है। पार्टी नेतृत्व इन क्षेत्रों को भविष्य में विस्तार की संभावनाओं के रूप में देख रहा है। क्षेत्रीय राजनीति में मजबूत पकड़ के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराना झामुमो की रणनीति का अहम हिस्सा बन चुका है।

गठन से राज्य निर्माण तक का सफर

53 साल पहले शिबू सोरेन, विनोद बिहारी महतो और एके राय ने मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की थी। सबसे बड़ा लक्ष्य अलग झारखंड राज्य का निर्माण था। इस दौरान कई नेता पार्टी से जुड़े और कुछ अलग भी हुए, लेकिन झामुमो अपनी पहचान बनाए रखने में सफल रही। निर्मल महतो जैसे साथियों की 1987 में हत्या के बाद गुरुजी ने केंद्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली। लंबा संघर्ष चला और आखिरकार वर्ष 2000 में झारखंड राज्य का सपना साकार हुआ।

स्थापना दिवस पर गुरुजी की कमी

इस स्थापना दिवस पर सबसे ज्यादा जो बात खलेगी, वह है गुरुजी की अनुपस्थिति। हालांकि उनका संघर्ष, उनका विजन और उनकी विरासत झामुमो की हर गतिविधि में जीवित है। यही विरासत आने वाले वर्षों में पार्टी की दिशा और दशा तय करती रहेगी।

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