डंटे रहो : न दैन्यम् न पलायनम् !

News Saga Desk

मनुष्य का अस्तित्व कोई अकेले के बस की बात नहीं है । अन्य या दूसरे के साथ सह अस्तित्व जीवन जीने के लिए अनिवार्य है । हिंसा और संघर्ष जीवन के विरुद्ध होता है। सहयोग, सहकार अब तक के ज्ञात राजनैतिक इतिहास को देखने पर भारत सतत रूप से एक शांति का आकांक्षी देश ही सिद्ध होता है । वह दूसरे देशों पर आधिपत्य स्थापित करने या अपना कब्जा जमाने की जगह शांति चाहता रहा है। अन्य देशों के साथ परस्पर सहयोग और समर्थन पाने की उसकी बलवती चाह रही है । इसी नीति के अनुसार आर्थिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में एक-दूसरे के साथ परस्पर जुड़ने के प्रयास को सदैव प्राथमिकता दी गई। कलह और संघर्ष में भारत की न रुचि रही है न कभी उसका भरोसा किया गया । अपने पड़ोसी देशों की ओर से भी भारत इसी भाव से प्रतिदान की कामना करता रहा है। इस तरह की नीति और आचरण के परिप्रेक्ष्य में हमारी विदेश नीति निर्धारित की जाती रही है। इसी अपेक्षा के साथ स्वतंत्र भारत शुरू से राजनय में अपने कदम बढ़ाता रहा है । किंतु दूसरों को अपनी ही तरह समझना खामखयाली ही साबित हुई और इतिहास गवाह है कि राजनयिक परिवेश में इस तरह की नीति के चलते भारत को कई बार नुकसान भी उठाना पड़ा ।

स्मरणीय है कि स्वतंत्र भारत के एक दशक बीतते-बीतते पड़ोसी चीन ने भाई-भाई के दिखावटी रिश्तों की आड़ में विश्वास को तोड़ कर धोखा दिया। यह भी सबको पता है कि तब भारत उस तरह की चुनौती के लिए बिलकुल तैयार नहीं था। तब से आज तक चीन के साथ सीमा के प्रश्न कई उतार-चढ़ावों के बीच से गुजरते आ रहे हैं। दूसरी ओर स्वयं चीन अपनी प्रगति से सबको चकित करते हुए विश्व पटल पर अमेरिका जैसी बड़ी हस्तियों से जोरदार टक्कर ले रहा है । उसकी उपस्थिति हर क्षेत्र में दर्ज हो रही है । शैक्षिक, राजनैतिक, तकनीकी, कृषि तथा सामरिक सभी क्षेत्रों में कीर्तिमान स्थापित करते हुए चीन की उपलब्धियां निश्चय ही अचंभित करने वाली हैं। सचमुच किसी भी देश की शक्ति और सामर्थ्य का कोई विकल्प नहीं होता है।

पाकिस्तान हमारा दूसरा पड़ोसी देश है जो खार खाये बैठा है और स्वतंत्र होने के साथ और बाद में ही लगातार आक्रामक रुख अपनाए हुए है । आतंकवाद, अलगाववाद तथा उग्रवाद को बढ़ावा देना और गतिरोध पैदा करना पाकिस्तान का मुख्य कार्य हो गया है। यह दुर्भाग्य ही था कि विभाजन की घोर मानवीय त्रासदी के बीच भारत के साथ ही उसका जन्म हुआ और तब से लेकर आज तक कलह और वैमनस्य की आंतरिक परिस्थितियों से वह लगातार जूझता आ रहा है । ऐसी स्थितियों का परिणाम राजनैतिक अस्थिरता, आपसी वैमनस्य और हिंसा के रूप में दिखता रहा है। वहां के प्रधानमंत्री और राष्ट्राध्यक्ष लगातार हत्या या फांसी के शिकार होते आए हैं । सेना का तख्तापलट भी वहां कई बार हुआ है । संघर्ष की बुनियाद पर टिका पाकिस्तान अपने जन्म के साथ ही भारत के साथ पट्टीदारी जैसी मानसिकता के साथ अविश्वास और द्रोह की भावना रखता आया है । चार युद्धों के अलावा शायद ही कोई ऐसा दिन बीतता होगा जब भारत की सीमा पर पाकिस्तान की ओर से शत्रुता भरी कोई छोटी-बड़ी घटना न होती रही हो । इसके बावजूद एक अच्छे पड़ोसी मान कर पाकिस्तान के साथ भारत संवाद और सहयोग के लिए सदा तत्पर रहा है। दूसरी ओर पाकिस्तान की तरफ से नकारात्मक रवैया अपनाया जाता रहा है। साथ ही वह भारत के बारे में दुष्प्रचार के साथ छद्म युद्ध भी चलाता रहा है ।

ध्यातव्य है कि पाकिस्तान के अनेक प्रांत अपनी समस्याओं के चलते अलगाववादी राह अपनाते रहे हैं । आजकल बलूच समुदाय की स्वतंत्रता की मांग जगजाहिर है । सच कहें तो आंतरिक अस्थिरता और आपसी मनमुटाव जैसे मुद्दों से वहां की सरकार लगातार जूझ रही है । ऐसे माहौल में सेना का राजनीतिक वर्चस्व बढ़ता रहता है और प्रधानमंत्री सिर्फ कुर्सीदार हो कर रह जाता है । सेना के महत्वाकांक्षी जनरल मौका देख राजनेता को आसानी से बेदखल कर तख्तनशीं बन कर राज करने लगता है । इस सिलसिले में आतंक और आतंकवादी तत्व भी सक्रिय होते रहे हैं जो पाकिस्तान के अंदर और बाहर ऊधम मचाने का काम करते हैं। इनके अलग–अलग स्रोत हैं। परंतु इन सब के ऊपर सरकार का आतंक को जायज मान कर अपनाना खतरनाक पहल है। सरकारी आतंक का प्रायोजित होना किसी भी सभ्य सरकार के लिए शर्मनाक और दुर्भाग्यपूर्ण है ।

सरकारपोषित आतंक की ताजी घटना पिछले महीने कश्मीर के पहलगाम नामक रमणीक स्थान पर हुई। यहां आतंकियों ने पर्यटन पर आए दो दर्जन से अधिक निहत्थे नागरिकों की गोली मार कर जघन्य हत्या कर दी। इस बर्बर घटना ने सभ्य समाज की आचरण की सारी हदों को पार कर दिया। इस दुर्घटना ने सभी भारतीयों को चोट पहुंचाई और यह सोचने पर मजबूर किया कि इस असह्य आतंक का प्रतिकार आवश्यक है। भारत ने संयम से काम लिया और सरकार ने गंभीर विचार-विमर्श के बाद आतंक के उन्मूलन के लिए जरूरी सैन्य कारवाई का निश्चय किया। आपरेशन सिंदूर चलाया गया और पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों को नष्ट किया। इस कारवाई में इस बात को सुनिश्चित करने की पूरी चेष्टा की गई कि आम पाकिस्तान के नागरिकों को कोई आघात न पहुंचे। पाकिस्तान को यह आतंकविरोधी प्रयास नागवार गुजरा और उसने आक्रामक रुख अपनाया। फाइटर जेट, ड्रोन और मिसाइल की सहायता से पाक सेना ने आक्रमण किया जिसको भारत के मुस्तैद सैन्य बलों ने पूरी तरह से विफल कर दिया पाकिस्तान की सेना को कई जेट और सुरक्षा प्रणाली से हाथ धोना पड़ा। सभी मतभेदों से ऊपर उठ कर पूरे भारत ने भारत की सेना की कारवाई का हृदय से स्वागत किया। आपरेशन सिंदूर सरकार और सेना के बेहतरीन सहयोग, तालमेल और समझदारी का बेजोड़ नमूना साबित हुआ।

पिछले कुछ दिनों में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री की मीडिया पर आतंक में सरकार के शामिल होने की खुले आम स्वीकारोक्ति सुन कर लोग दंग रह गए । भारत की सीमा पर आतंकवादी घटनाएं लगातार होती रही हैं और सीमा पार के इलाकों में आतंकवादी संगठनों को धन, प्रशिक्षण और साजो-सामान से लैस कर तरह-तरह से सरकती प्रश्रय दिया जाता रहा है । सरकार, सेना और आतंकी तीनों का मेल क्या कुछ कर सकता है यह पाकिस्तान के द्वारा किए जाने वाले कई हस्तक्षेप की घटनाओं से प्रमाणित है। मुंबई, पुलवामा और अब पहलगाम की घटनाओं से पाकिस्तान की सरकारी दहशतगर्दी की पुष्टि करते हैं जो अक्षम्य है । भारत सदैव आतंकवाद का विरोध करता रहा है और उसे रोकने के लिए प्रतिबद्ध है । यह आततायी से आत्मरक्षा का प्रश्न बन चुका है । भारत ने पाकिस्तान को नियंत्रित करने के लिए आर्थिक और राजनैतिक प्रतिबंध लागू करने कई कदम उठाए।

आतंकवाद को समाप्त करने की दृष्टि से उनके लिए स्थापित प्रशिक्षण केंद्रों को ठिकाने लगाने के लिए भारत ने आपरेशन सिंदूर चलाया, जिसके तहत सेना की गई सटीक और केंद्रित कारवाई में पाकिस्तान के आतंकवाद के अनेक केंद्रों को नष्ट किया और अनेक आतंकी हताहत हुए । मीडिया की खबरों से यह भी पता चला कि इन आतंकियों के जनाजों में सरकार और सेना के कई उच्चाधिकारी भी शामिल हुए और आतंकियों को राजकीय सम्मान के साथ गार्ड ऑफ आनर भी दिया गया । आतंक के प्रति खास आकर्षण के बावजूद पाकिस्तान के राजनेताओं को लगा कि युद्ध से कोई लाभ नहीं होगा और वे संघर्ष-विराम के लिए राजी हो गए। कुछ घंटों बाद सीमा के कई क्षेत्रों से संघर्ष विराम के उल्लंघन की खबरें भी आईं। उसके बाद फिलहाल शांति दिख रही है। पाकिस्तान सरकार और सेना के रुख को देखते हुए यह तनाव क्या रूप लेगा कहना कठिन है। भारत का राष्ट्रीय नेतृत्व सतर्क और तत्पर ढंग से सामरिक तैयारी की ओर ध्यान देता रहा है और आतंक के प्रतिरोध के लिए यत्न करने के साथ अंतरराष्ट्रीय राजनय को साथ ले चलने की कोशिश भी करता रहा है। इन प्रयासों के परिणाम भी हमारे सामने हैं। आज देश एकजुट होकर आतंकवादी कोशिशों को समाप्त करने के लिए दृढ़ है। इस अवसर पर पीछे हटना दुर्बलता होगी। इसलिए हमारा सूत्र होना चाहिए न दैन्यम् न पलायनम् !

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