News Saga Desk
भारत और अमेरिका के रिश्तों की बुनियाद हमेशा से बहुआयामी रही है। कभी ये रिश्ते केवल रणनीतिक सहयोग तक सीमित नजर आते हैं, तो कभी ये ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा खरीद, तकनीक और वैश्विक मंच पर आपसी साझेदारी की नई परिभाषा गढ़ते हैं। किंतु जैसा कि हम सभी ने हाल के दिनों में देखा; कैसे भारत के विरोध में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ही नहीं उनके सलाहकार भी बयान दे रहे थे, इससे एक बात तो साफ है कि भारत अब अमेरिका के दबाव में आने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों और दीर्घकालिक रणनीतियों के अनुरूप फैसले ले रहा है, जिन्हें वॉशिंगटन स्वीकार नहीं कर पा रहा। पर इसमें भी अब कुछ माह के तल्ख संबंधों के बाद अमेरिका की ओर से फिर नरमी दिखना शुरू हो गई है।
वस्तुत: यह स्थिति इसलिए भी खास है क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत की आलोचना में तमाम गोते लगाने के बाद आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपना सबसे भरोसेमंद मित्र कह रहे हैं, दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी हैं कि जिन्होंने बहुत संतुलित भाषा में अपना स्पष्ट संदेश दिया है, जिसका सार यह है कि भारत और अमेरिका अच्छे दोस्त हैं, परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि भारत द्वारा कोई विशेष महत्व यूएस को दिया जाएगा। भारत समय-समय पर अपनी विदेश नीति को उसकी प्राथमिकताओं के हिसाब से बदलेगा। यही कूटनीतिक संतुलन अब भारत की ऊर्जा नीति में भी साफ नजर आ रहा है।
इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (आईओसी) का हालिया निर्णय इस संतुलन की ठोस मिसाल है। आईओसी ने अमेरिका से बड़े पैमाने पर क्रूड आयात करने के बजाय पश्चिम अफ्रीका और मध्य पूर्व से तेल खरीदने का फैसला किया है। नाइजीरिया से अगबामी और उसान तेल ग्रेड के 20 लाख बैरल तथा अबू धाबी से दास क्रूड के 10 लाख बैरल खरीदकर भारत ने यह जता दिया है कि वह एक आपूर्तिकर्ता पर निर्भर नहीं रहेगा। इससे पहले आईओसी अमेरिका से वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) क्रूड के लगभग 50 लाख बैरल तक खरीदता था। अब इस पैमाने को घटाना और आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाना न केवल एक आर्थिक कदम है, बल्कि रणनीतिक संदेश भी है।
देखा जाए तो यह फैसला अमेरिका के लिए बड़ा झटका है, क्योंकि वह वैश्विक स्तर पर क्रूड का बड़ा निर्यातक बन चुका है। ट्रंप प्रशासन भारत को अमेरिकी क्रूड का एक स्थायी और बड़ा बाजार मानता रहा है। लेकिन भारत ने अपने कदम से दिखा दिया है कि वह किसी एक देश की आर्थिक मजबूरियों या राजनीतिक अपेक्षाओं के अनुसार नहीं चलेगा। यह बदलाव दरअसल भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा नीति का हिस्सा है, जो इस सिद्धांत पर आधारित है कि वैश्विक बाजार की अनिश्चितताओं, राजनीतिक तनावों और क्षेत्रीय संघर्षों के बीच केवल विविध स्रोतों और मजबूत आपूर्ति नेटवर्क से ही स्थिरता हासिल की जा सकती है।
भारत ने रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रूसी क्रूड खरीद कर पहले ही दिखा दिया था कि वह पश्चिमी दबाव को दरकिनार कर अपने आर्थिक हितों को प्राथमिकता देगा। रूस से सस्ता तेल खरीदने से भारत को प्रत्यक्ष लाभ हुआ लेकिन इसके कारण अमेरिका ने बेतुके टैरिफ लगा दिए और दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा। भारत ने इसका भी कूटनीतिक और आर्थिक जवाब ढूँढ लिया, तेल आयात के नए विकल्प तलाश कर। पश्चिम अफ्रीका और मध्य पूर्व से क्रूड खरीदने का फैसला इसी रणनीति का हिस्सा है। यह कदम न केवल अमेरिकी दबाव को कम करता है, बल्कि अफ्रीकी देशों के साथ भारत के संबंधों को भी मजबूत करता है।
नाइजीरिया और अंगोला जैसे अफ्रीकी देश लंबे समय से स्थायी ग्राहकों की तलाश में हैं। वैश्विक ऊर्जा बाजार में प्रतिस्पर्धा इतनी अधिक है कि कई बार इन देशों को अपने उत्पादन के स्थायी खरीदार नहीं मिलते। भारत के इस कदम से उन्हें स्थिर आय और नया बाजार मिलेगा। इसके साथ ही मध्य पूर्व, विशेषकर अबू धाबी के साथ संबंध भी और प्रगाढ़ होंगे। अबू धाबी से खरीदा गया दास क्रूड ‘डिलीवर्ड’ आधार पर है, जबकि नाइजीरिया का तेल ‘फ्री-ऑन-बोर्ड’ आधार पर है। इसका मतलब है कि भारत अपनी शर्तों पर समझौते कर रहा है और आपूर्ति के जोखिम को भी संतुलित कर रहा है।
यहाँ यह समझना जरूरी है कि भारत की ऊर्जा नीति केवल तेल तक सीमित नहीं है। यह दरअसल उसकी समग्र विदेश नीति का अहम हिस्सा है। जब ट्रंप भारत के सामने मित्रता की पेशकश करते हैं और मोदी उसके जवाब में संतुलित भाषा का प्रयोग करते हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत स्तर की कूटनीति नहीं है। इसके पीछे भारत का व्यापक संदेश छिपा है कि वह किसी भी रिश्ते को ‘विशेष निर्भरता’ में नहीं बदलने देगा। अमेरिका के लिए यह सीख है कि भारत के साथ रिश्ते समानता और परस्पर सम्मान के आधार पर ही आगे बढ़ सकते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा निचोड़ यही है कि भारत अब ऊर्जा कूटनीति के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है। वह न केवल विकल्प तलाश रहा है, बल्कि वैश्विक बाजार में अपनी सौदेबाजी की शक्ति (Bargaining power) भी बढ़ा रहा है। जब भारत अलग-अलग देशों से क्रूड खरीदेगा, तो उसकी सौदेबाजी की क्षमता बढ़ेगी। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर सीमित होगा और आपूर्ति की निरंतरता बनी रहेगी। यह स्थिति घरेलू ऊर्जा सुरक्षा के लिए निर्णायक साबित होगी। दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भारत के इस कदम से अमेरिका को यह संदेश गया है कि उसके आर्थिक दबावों और टैरिफ नीतियों से भारत विचलित नहीं होगा। भारत मित्रता चाहता है, सहयोग चाहता है लेकिन किसी भी कीमत पर अपनी नीतिगत स्वतंत्रता नहीं छोड़ेगा। यही वह बिंदु है, जहाँ मोदी का संतुलित संदेश और आईओसी का रणनीतिक निर्णय एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।
इसके साथ ही हमें इस सच्चाई को भी स्वीकारना होगा कि आज की वैश्विक राजनीति में ऊर्जा ही वह क्षेत्र है जो सबसे अधिक असर डालता है। यूरोप रूस पर निर्भरता के कारण संकट में फँसता है, चीन अपने तेल आयात के लिए मध्य एशिया और अफ्रीका पर पकड़ मजबूत करता है और अमेरिका अपनी शेल गैस क्रांति को निर्यात में बदल कर प्रभाव बनाए रखना चाहता है। ऐसे परिदृश्य में भारत का यह कदम उसे न केवल आत्मनिर्भर बनाता है, बल्कि उसे एक निर्णायक खिलाड़ी के रूप में भी स्थापित करता है। अफ्रीका और मध्य पूर्व के साथ संबंध गहरे करने से भारत के लिए नए कूटनीतिक और आर्थिक अवसर खुलेंगे।
कुल सार यह है कि भारत अब उस दौर से बाहर आ चुका है, जहाँ उसे अमेरिका या किसी भी महाशक्ति की स्वीकृति की आवश्यकता थी। आज भारत अपने हितों को सामने रखकर फैसले कर रहा है और दुनिया को अपनी शर्तों पर सहयोग के लिए तैयार करता है। अमेरिका या अन्य देश कुछ भी कहें, किंतु आज के भारत की नीति यही कहती है, संवाद समानता की शर्त पर ही होगा। कहना होगा कि आईओसी का तेल आयात निर्णय इसी नए भारत की ऊर्जा और विदेश नीति का सबसे ताजा और ठोस उदाहरण है।
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