भगवान जगन्नाथ नेत्रदान उत्सव के बाद 15 दिन के एकांतवास से बाहर आए। रांची में रथ यात्रा, दर्शन, विशेष पूजा और 25 जुलाई तक चलने वाले मेले की पूरी जानकारी पढ़ें।
भगवान जगन्नाथ नेत्रदान उत्सव के साथ रांची में धार्मिक आस्था का सबसे बड़ा पर्व शुरू हो गया है। 15 दिनों के एकांतवास (अनवसर) के बाद भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा ने बुधवार को भक्तों को दर्शन दिए। मंदिर के पट खुलते ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी और पूरे परिसर में “जय जगन्नाथ” के जयकारे गूंजने लगे। नेत्रदान उत्सव के साथ ही वार्षिक रथ मेला भी शुरू हो गया है, जो 25 जुलाई तक चलेगा। मंदिर प्रशासन ने श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशेष व्यवस्थाएं की हैं।

भगवान जगन्नाथ नेत्रदान उत्सव का धार्मिक महत्व
भगवान जगन्नाथ नेत्रदान उत्सव का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान 15 दिनों तक अस्वस्थ रहने के कारण एकांतवास में रहते हैं। इस अवधि में आम श्रद्धालुओं के लिए मंदिर के पट बंद रहते हैं। इसके बाद नेत्रदान संस्कार संपन्न होने पर भगवान पुनः भक्तों को दर्शन देते हैं। इसी परंपरा का पालन करते हुए बुधवार को विशेष पूजा-अर्चना और श्रृंगार के बाद भगवान के दर्शन शुरू हुए।
शाम पांच बजे मंदिर के पट खोले गए। इसके बाद 108 दीपों से मंगल आरती की गई और भगवान को इलायची दाना, बादाम तथा मालपुआ का विशेष भोग अर्पित किया गया। दोपहर से ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचने लगे थे और देर रात तक दर्शन-पूजन का क्रम चलता रहा।

विशेष पूजा और रथ यात्रा की तैयारियां
मुख्य पुजारी रामेश्वर पाढ़ी ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पूजा संपन्न कराई। इस दौरान पंडित कौस्तुभधरनाथ मिश्रा, ऋषिकेश मोहंती सहित अन्य पुजारियों ने सभी धार्मिक अनुष्ठानों को परंपरा के अनुसार पूरा किया।
गुरुवार तड़के मंदिर के पट खोले गए और सुबह पांच बजे से श्रद्धालुओं के लिए दर्शन प्रारंभ हुए। दोपहर दो बजे तक दर्शन का समय निर्धारित किया गया। इसके बाद भगवान के विग्रहों को रथ पर विराजमान किया जाएगा और उनका विशेष श्रृंगार किया जाएगा। शाम पांच बजे भव्य रथ यात्रा शुरू होगी, जिसमें हजारों श्रद्धालु भगवान के रथ को खींचते हुए मौसीबाड़ी तक ले जाएंगे।
साल में केवल एक दिन लगता है विशेष भोग
रथ यात्रा के अवसर पर भगवान को विशेष प्रकार का भोग अर्पित किया जाता है। इस दिन बाल भोग और अन्न भोग एक साथ लगाया जाता है, जो पूरे वर्ष में केवल इसी अवसर पर होता है। भगवान को चावल से बने अन्न भोग के साथ मीठा पुलाव भी अर्पित किया जाएगा। वहीं रात्रि में मालपुआ, बुंदिया और छिलका रोटी का भोग लगाया जाएगा। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहती है।
नेत्रदान उत्सव के साथ शुरू हुआ रथ मेला
भगवान जगन्नाथ नेत्रदान उत्सव के साथ ही रथ मेले का शुभारंभ भी हो गया है। मुख्य मंदिर से लेकर मौसीबाड़ी तक सड़क के दोनों ओर अस्थायी दुकानें सज गई हैं। मेले में धार्मिक सामग्री, खिलौने, हस्तशिल्प, घरेलू उपयोग की वस्तुएं तथा स्थानीय व्यंजन उपलब्ध हैं। बच्चों और परिवारों के लिए झूले तथा मनोरंजन की अन्य व्यवस्थाएं भी की गई हैं।
मेला 25 जुलाई तक चलेगा। प्रशासन की ओर से सुरक्षा, यातायात नियंत्रण, पेयजल, चिकित्सा सहायता और सफाई व्यवस्था को मजबूत किया गया है ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े।
पृष्ठभूमि: क्यों होता है 15 दिनों का एकांतवास?
जगन्नाथ परंपरा के अनुसार स्नान पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का महा स्नान कराया जाता है। इसके बाद उन्हें ज्वर होने की मान्यता है और वे 15 दिनों तक एकांतवास में रहते हैं। इस अवधि को “अनवसर” कहा जाता है। इस दौरान भगवान के दर्शन नहीं होते और विशेष रूप से उनकी सेवा की जाती है। नेत्रदान उत्सव के बाद भगवान नए स्वरूप में भक्तों को दर्शन देते हैं और फिर रथ यात्रा का आयोजन किया जाता है।

श्रद्धालुओं और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
भगवान जगन्नाथ नेत्रदान उत्सव और रथ यात्रा केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण अवसर हैं। मेले में लगने वाली अस्थायी दुकानों से छोटे व्यापारियों को अच्छी आमदनी होती है। होटल, परिवहन और खाद्य व्यवसाय से जुड़े लोगों को भी इसका लाभ मिलता है। वहीं हजारों श्रद्धालुओं के आगमन से शहर में उत्साह और धार्मिक वातावरण बना हुआ है।
इसे भी देखें…गो सम्मान अभियान: गौहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग | 5 करोड़ से ज्यादा हस्ताक्षर जुटे
आधिकारिक जानकारी
मुख्य पुजारी रामेश्वर पाढ़ी ने बताया कि सभी धार्मिक अनुष्ठान पारंपरिक विधि-विधान के अनुसार संपन्न किए गए हैं। मंदिर समिति ने श्रद्धालुओं से निर्धारित समय का पालन करने और प्रशासन द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन करने की अपील की है, ताकि रथ यात्रा और दर्शन व्यवस्था सुचारु रूप से संचालित हो सके।
श्रद्धालुओं के लिए जरूरी सूचना
रथ यात्रा में शामिल होने वाले श्रद्धालुओं से अनुरोध किया गया है कि वे भीड़ के दौरान संयम बनाए रखें और सुरक्षा व्यवस्था में सहयोग करें। महिला श्रद्धालुओं के लिए शाम 6:45 बजे तक रथ पर चढ़कर पूजा-अर्चना की विशेष व्यवस्था की गई है। इसके बाद भगवान के विग्रहों को मौसीबाड़ी में प्रवेश कराया जाएगा। शाम सात से आठ बजे तक आम श्रद्धालु दर्शन और पूजा कर सकेंगे, जबकि रात आठ बजे भगवान का शयन होगा।
No Comment! Be the first one.