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पलामू के चियांकी गांव में एनएच निर्माण के दौरान मारपीट और जातिसूचक टिप्पणी के आरोप में महिला ने एससी-एसटी एक्ट के तहत विशेष न्यायालय में परिवाद दायर किया। अगली सुनवाई 7 अगस्त को होगी।
पलामू में एनएच निर्माण के दौरान मारपीट और जातिसूचक टिप्पणी का मामला अब न्यायालय पहुंच गया है। मेदिनीनगर सदर अंचल के चियांकी गांव की एक महिला ने राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच) निर्माण कार्य के दौरान अपने और परिवार के साथ मारपीट तथा जातिसूचक टिप्पणी किए जाने का आरोप लगाते हुए विशेष न्यायालय में परिवाद दायर किया है। न्यायालय ने परिवाद दर्ज कर मामले में अगली सुनवाई की तिथि 7 अगस्त 2026 निर्धारित की है।
परिवादिनी चिंता कुमारी ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रथम सह विशेष न्यायालय (अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम) में याचिका दायर कर कई अधिकारियों और अन्य व्यक्तियों को आरोपित बनाया है। पलामू में एनएच निर्माण के दौरान मारपीट और जातिसूचक टिप्पणी का मामला सामने आने के बाद यह प्रकरण चर्चा का विषय बन गया है।

किन लोगों को बनाया गया आरोपित
दायर परिवाद में सदर अनुमंडल पदाधिकारी संजय पांडे, सदर अंचल अधिकारी जागा महतो, सदर थाना प्रभारी अफजल अंसारी, राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़े पदाधिकारी सुबोध शर्मा, सूरज कुमार, सतीश मेहता, राकेश सिंह, आदित्य प्रकाश, एसआई सुजीत पांडे सहित अन्य लोगों को आरोपित बनाया गया है।
परिवाद में आरोप लगाया गया है कि एनएच निर्माण कार्य के दौरान हुई घटना में इन लोगों की भूमिका रही। हालांकि, इस मामले में आरोपित पक्ष का पक्ष समाचार लिखे जाने तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है।
महिला ने क्या लगाए आरोप?
परिवादी पक्ष के अधिवक्ता रुचिर कुमार तिवारी के अनुसार, चिंता कुमारी का कहना है कि 9 जुलाई को एनएच निर्माण कार्य के दौरान उनके और उनके परिजनों के साथ मारपीट की गई। साथ ही धनगर जनजाति को लेकर जातिसूचक शब्दों का प्रयोग कर उनका अपमान किया गया।
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परिवाद में यह भी कहा गया है कि घटना के बाद पीड़िता ने स्थानीय पुलिस से न्याय की मांग की, लेकिन अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने पर उन्हें न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
पुलिस में शिकायत के बाद न्यायालय का रुख
पलामू में एनएच निर्माण के दौरान मारपीट और जातिसूचक टिप्पणी का मामला दर्ज कराने से पहले पीड़िता ने सदर थाना और पुलिस अधीक्षक कार्यालय में भी शिकायत की थी।
परिवाद के अनुसार, प्राथमिकी दर्ज नहीं होने के कारण उन्होंने एससी-एसटी एक्ट के प्रावधानों के तहत विशेष न्यायालय में परिवाद दायर किया। इसके बाद न्यायालय ने मामले का संज्ञान लेते हुए इसे दर्ज कर लिया।
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