झारखंड DGP तदाशा मिश्रा की नियुक्ति पर SC में सुनवाई आज

झारखंड DGP तदाशा मिश्रा की नियुक्ति का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। केंद्र ने अवमानना कार्रवाई की मांग की है। आज मामले पर सुनवाई होगी।

News Saga Desk

झारखंड की वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी तदाशा मिश्रा की पुलिस महानिदेशक (DGP) के पद पर नियुक्ति का मामला एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। केंद्र सरकार ने झारखंड सरकार और अन्य के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग करते हुए याचिका दायर की है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की इस याचिका को 8 अक्टूबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई है।

तदाशा मिश्रा की नियुक्ति से जुड़ी कुछ अन्य याचिकाएं भी पहले से सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। अब केंद्र की अवमानना याचिका की सुनवाई भी इन्हीं मामलों के साथ होने की संभावना है। ऐसे में गुरुवार की सुनवाई को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

CJI की पीठ के सामने केंद्र ने उठाया मामला

बुधवार को केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भारत के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष इस मामले का उल्लेख किया। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं।

तुषार मेहता ने अदालत से अनुरोध किया कि केंद्र की ओर से दायर अवमानना याचिका को तदाशा मिश्रा की DGP नियुक्ति से संबंधित पहले से लंबित याचिकाओं के साथ सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए। CJI की पीठ ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए मामले को गुरुवार की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति दी।

सेवानिवृत्ति से एक दिन पहले हुई थी नियुक्ति

तदाशा मिश्रा की नियुक्ति का सबसे अहम पहलू उनकी सेवानिवृत्ति की तारीख से जुड़ा है। झारखंड सरकार ने 30 दिसंबर 2025 को तदाशा मिश्रा को राज्य का DGP नियुक्त किया था। बताया गया कि उनकी सेवानिवृत्ति 31 दिसंबर 2025 को निर्धारित थी।

यानी DGP के पद पर नियुक्ति के समय उनकी सेवा अवधि महज एक दिन बची थी। इसी वजह से नियुक्ति की प्रक्रिया और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुपालन को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

छह महीने की सेवा का नियम बना मुद्दा

मामले में छह महीने की न्यूनतम सेवा अवधि का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता और न्यायमित्र राजू रामचंद्रन ने DGP नियुक्ति से जुड़े दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए कहा था कि नियुक्ति के समय अधिकारी की कम से कम छह महीने की सेवा शेष होनी चाहिए।

तदाशा मिश्रा की नियुक्ति के मामले में यह अवधि पूरी नहीं होने को लेकर सवाल उठाए गए हैं। इसी आधार पर उनकी नियुक्ति को लेकर कानूनी विवाद लगातार जारी है।

प्रकाश सिंह मामले के दिशा-निर्देशों का हवाला

DGP की नियुक्ति से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का आधार 2006 का प्रकाश सिंह फैसला है। इन दिशा-निर्देशों के तहत राज्य सरकार को DGP के पद के लिए UPSC द्वारा तैयार पैनल में शामिल अधिकारियों में से चयन करना होता है।

पैनल तैयार करते समय अधिकारियों के सेवाकाल, सेवा रिकॉर्ड और पुलिस बल का नेतृत्व करने के अनुभव जैसे पहलुओं को ध्यान में रखा जाता है। DGP नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर राज्यों को इन दिशा-निर्देशों का पालन करना होता है।

दो साल के कार्यकाल का भी प्रावधान

सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों में DGP के लिए न्यूनतम दो साल के कार्यकाल का प्रावधान भी है। इसके अनुसार अधिकारी की सेवानिवृत्ति की तारीख कुछ भी हो, DGP के रूप में नियुक्ति के बाद न्यूनतम दो वर्ष का कार्यकाल सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

तदाशा मिश्रा की नियुक्ति से जुड़े विवाद में इसी प्रावधान के साथ उनकी नियुक्ति के समय बची सेवा अवधि को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

केंद्र ने मांगी अवमानना कार्रवाई

केंद्र सरकार ने अपनी याचिका में झारखंड सरकार की कार्रवाई को सुप्रीम कोर्ट के DGP नियुक्ति से जुड़े दिशा-निर्देशों के संदर्भ में चुनौती दी है। केंद्र की ओर से अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का अनुरोध किया गया है।

वहीं, तदाशा मिश्रा की नियुक्ति को चुनौती देने वाली पहले से लंबित याचिकाओं में भी नियुक्ति की प्रक्रिया और उसकी वैधता को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

आज सुप्रीम कोर्ट में होगी सुनवाई

अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर सबकी नजरें टिकी हैं। केंद्र की अवमानना याचिका के साथ DGP नियुक्ति से संबंधित अन्य मामलों पर भी सुनवाई प्रस्तावित है।

अदालत के सामने मुख्य मुद्दा यह होगा कि तदाशा मिश्रा की DGP के रूप में नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों और बाद में जारी आदेशों के अनुरूप थी या नहीं। साथ ही, छह महीने की सेवा अवधि और दो साल के न्यूनतम कार्यकाल से जुड़े प्रावधानों पर भी अदालत के सामने पक्ष रखे जा सकते हैं।

फिलहाल, मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि तदाशा मिश्रा की नियुक्ति को लेकर आगे की कानूनी प्रक्रिया किस दिशा में जाती है।

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