नई ‘रामायण’ के स्वयंवर गीत में सूफियाना रंग देखकर पुराने ‘लक्ष्मण’ सुनील लहरी निराश हो गए हैं। उन्होंने एआर रहमान के संगीत पर सवाल उठाते हुए मिथिला की लोक परंपराओं की झलक न होने पर आपत्ति जताई है। पढ़ें पूरी खबर।
रामानंद सागर के ऐतिहासिक धारावाहिक ‘रामायण’ में ‘लक्ष्मण’ का अमर किरदार निभाकर घर-घर में अपनी खास पहचान बनाने वाले अभिनेता सुनील लहरी इन दिनों आने वाली नई ‘रामायण’ को लेकर लगातार चर्चा में हैं। सुनील लहरी को न केवल नई फिल्म की स्टारकास्ट और किरदारों का अंदाज खटक रहा है, बल्कि अब फिल्म के संगीत ने भी उन्हें बेहद निराश किया है। खासकर, माता सीता के स्वयंवर के दौरान बजाए जाने वाले गीत को लेकर उन्होंने कड़ी आपत्ति जताई है। उनका मानना है कि ऑस्कर विजेता संगीतकार एआर रहमान द्वारा तैयार किए गए इस गाने में मिथिला की मिट्टी की खुशबू के बजाय सूफी और कव्वाली का प्रभाव झलकता है।

सीता के स्वयंवर में मिथिला के लोकगीत क्यों नदारद?
एक मीडिया संस्थान के साथ एक्सक्लूसिव बातचीत के दौरान सुनील लहरी ने खुलकर अपनी राय रखी। उन्होंने बताया कि उन्होंने स्वयंवर गीत का कुछ हिस्सा ही सुना है, लेकिन उसी अंश में उन्हें सूफी या कव्वाली जैसा पैटर्न महसूस हुआ, जो रामायण के इस पवित्र प्रसंग के लिहाज से उन्हें बिल्कुल भी रास नहीं आया।
सुनील लहरी का तर्क है कि माता सीता का संबंध सीधे तौर पर मिथिला से था और वहां विवाह के अपने अनूठे पारंपरिक लोकगीत, विशेष धुनें और गहरी सांस्कृतिक परंपराएं मौजूद हैं। ऐसे में सीता के स्वयंवर जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण और भव्य प्रसंग में उस विशेष संस्कृति की जीवंत झलक होनी चाहिए थी। उनके अनुसार, यह कोई आम या आधुनिक फिल्मी शादी का दृश्य नहीं है, बल्कि यह त्रेतायुग की वह गाथा है जिसमें मिथिला नरेश राजा जनक की पुत्री सीता का स्वयंवर रचाया जा रहा है। ऐसे दृश्यों में संगीत केवल मनोरंजन या माहौल बनाने का जरिया नहीं होता, बल्कि उस क्षेत्र विशेष की संस्कृति को पर्दे पर जीवंत करने का सबसे बड़ा माध्यम होता है।
एआर रहमान के चयन और काम पर उठाए सवाल
सुनील लहरी ने इस फिल्म के लिए देश के दिग्गज संगीतकार एआर रहमान के चयन पर भी अपनी बात रखी। उनका कहना है कि एआर रहमान जैसे महान और अनुभवी संगीतकार से दर्शकों को बहुत ज्यादा उम्मीदें होती हैं। ऐसे बड़े कलाकारों को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि दृश्य किस भौगोलिक स्थिति, किस दौर और किस सांस्कृतिक परिवेश से जुड़ा हुआ है।
मिथिला की अपनी विवाह गीत परंपराएं और लोक संगीत इतना समृद्ध है कि अगर उन्हीं पारंपरिक धुनों को आधार बनाकर गाना तैयार किया जाता, तो स्वयंवर का यह दृश्य পর্দ पर कहीं अधिक प्रामाणिक, भव्य और प्रभावशाली बन सकता था। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने अभी पूरा गाना नहीं सुना है, इसलिए उनकी यह टिप्पणी उनके द्वारा सुने गए हिस्से पर ही आधारित है, लेकिन वह अंश उन्हें कतई प्रभावित नहीं कर सका।
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