भागलपुर में 3.41 करोड़ रुपये से बने 25 ई-टॉयलेट रखरखाव के अभाव में बदहाल हैं। कई जगह बिजली-पानी कनेक्शन और जरूरी उपकरण तक खराब हैं।
News saga Desk
भागलपुर में स्मार्ट सिटी योजना के तहत आम जनता को आधुनिक सुविधाएं देने के लिए बनाए गए ई-टॉयलेट अब बदहाली की तस्वीर पेश कर रहे हैं। करीब 3.41 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किए गए 25 ई-टॉयलेट का उद्देश्य राहगीरों और शहरवासियों को स्वच्छ और हाईटेक शौचालय सुविधा उपलब्ध कराना था, लेकिन रखरखाव की कमी के कारण इनमें से ज्यादातर अब उपयोग के लायक नहीं रह गए हैं। ऐसे में भागलपुर ई-टॉयलेट परियोजना पर खर्च हुई बड़ी रकम के बावजूद जनता को अपेक्षित सुविधा नहीं मिल पा रही है।
शहर के प्रमुख सार्वजनिक स्थलों पर लगाए गए इन ई-टॉयलेट में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाना था। योजना के तहत ऑटोमैटिक डोर सिस्टम, सेंसर आधारित फ्लशिंग और क्लीनिंग तथा स्मार्ट वाटर मीटर जैसी सुविधाएं प्रस्तावित थीं। लेकिन जमीनी स्थिति इन दावों से बिल्कुल अलग नजर आ रही है।
3.41 करोड़ रुपये की थी परियोजना
जानकारी के अनुसार, भागलपुर स्मार्ट सिटी लिमिटेड की ओर से शहर में कुल 25 ई-टॉयलेट लगाने की योजना तैयार की गई थी। इस पूरी परियोजना पर करीब 3.41 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इसका उद्देश्य सार्वजनिक स्थानों पर स्वच्छता और आधुनिक नागरिक सुविधाओं को बढ़ावा देना था।
परियोजना के तहत शहर के 12 प्रमुख और भीड़भाड़ वाले स्थानों को चिन्हित किया गया था। इनमें सैंडिस कंपाउंड मैदान, लाजपत पार्क, मुख्य बस डिपो क्षेत्र समेत कई महत्वपूर्ण सार्वजनिक और व्यावसायिक क्षेत्र शामिल थे।
इन स्थानों पर ई-टॉयलेट लगाए जाने से राहगीरों और स्थानीय लोगों को सार्वजनिक शौचालय के लिए बेहतर विकल्प मिलने की उम्मीद थी। लेकिन समय के साथ उचित संचालन और रखरखाव के अभाव में योजना की स्थिति खराब होती चली गई।
पांच साल तक रखरखाव की थी जिम्मेदारी
इस परियोजना का काम सर्वश्री रिलायबल एंटरप्राइजेज नामक एजेंसी को सौंपे जाने की बात सामने आई है। अनुबंध के अनुसार एजेंसी को ई-टॉयलेट स्थापित करने के साथ पांच वर्षों तक इनके संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी निभानी थी।

हालांकि, उपलब्ध जानकारी के मुताबिक निर्माण पूरा होने के बाद एजेंसी ने अपने दायित्वों का प्रभावी तरीके से पालन नहीं किया। नगर निगम और स्मार्ट सिटी प्रबंधन की ओर से समीक्षा बैठकों और नोटिसों के बावजूद एजेंसी के प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति की बात भी सामने आई है।
इसका सीधा असर भागलपुर ई-टॉयलेट की व्यवस्था पर पड़ा। नियमित रखरखाव नहीं होने से धीरे-धीरे कई यूनिट खराब होती गईं और सार्वजनिक उपयोग के लिए अनुपयोगी हो गईं।
बिजली-पानी तक की व्यवस्था बदहाल
ई-टॉयलेट में आधुनिक तकनीक लगाए जाने का दावा किया गया था, लेकिन कई स्थानों पर बुनियादी सुविधाएं ही सुचारू नहीं हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, कई यूनिट में पानी और बिजली के कनेक्शन की समस्या बनी हुई है।
कुछ जगहों पर शौचालय के दरवाजे और जरूरी उपकरण टूटने या चोरी होने की भी जानकारी सामने आई है। इससे करोड़ों रुपये की लागत से तैयार की गई परियोजना की उपयोगिता पर सवाल उठ रहे हैं।
जिस तकनीक के जरिए सफाई व्यवस्था को आसान और कम मानव-निर्भर बनाने की योजना थी, वही तकनीक रखरखाव के अभाव में बेकार होती नजर आ रही है। ऐसे में शहरवासियों को हाईटेक सुविधा मिलने के बजाय सार्वजनिक स्थानों पर बदहाल ढांचे दिखाई दे रहे हैं।
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स्वच्छता अभियान के बीच योजना पर सवाल
भागलपुर में ई-टॉयलेट परियोजना की बदहाली ऐसे समय में सामने आई है, जब केंद्र और राज्य सरकारें सार्वजनिक स्वच्छता तथा साफ-सफाई को लेकर लगातार अभियान चला रही हैं। सार्वजनिक स्थलों पर स्वच्छ शौचालय उपलब्ध कराना शहरी स्वच्छता व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी सुविधा का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है, तो योजना की निगरानी और जवाबदेही पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
हालांकि, अधिकारियों या संबंधित एजेंसी की ओर से लगाए गए आरोपों और कथित अनियमितताओं पर विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं है। इसलिए किसी भी भ्रष्टाचार या मिलीभगत के आरोप को जांच के निष्कर्ष के आधार पर ही निश्चित माना जा सकता है।
परियोजना की खराब स्थिति के बाद अब नगर निगम और स्मार्ट सिटी प्रशासन के बीच इन्हें दोबारा चालू कराने को लेकर कवायद शुरू होने की जानकारी सामने आई है। नई एजेंसी के माध्यम से ई-टॉयलेट को फिर से संचालित करने की योजना पर विचार किया जा रहा है।
अगर यह योजना प्रभावी तरीके से लागू होती है तो लंबे समय से बेकार पड़े इन सार्वजनिक शौचालयों का इस्तेमाल दोबारा शुरू हो सकता है। इसके लिए केवल मरम्मत ही नहीं, बल्कि पानी, बिजली, सफाई, सुरक्षा और नियमित रखरखाव की स्थायी व्यवस्था जरूरी होगी।
भागलपुर के लोगों के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि 3.41 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद तैयार किए गए इन ई-टॉयलेट का वास्तविक लाभ उन्हें कब मिलेगा। आधुनिक तकनीक और बेहतर सार्वजनिक सुविधा के उद्देश्य से शुरू की गई योजना अगर लंबे समय तक बंद रहती है तो इससे सरकारी खर्च और परियोजना की उपयोगिता दोनों पर सवाल उठते हैं।
अब निगाह इस बात पर है कि स्मार्ट सिटी और नगर निगम प्रशासन इन यूनिट को दोबारा चालू कराने के लिए क्या ठोस कदम उठाता है। साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि भविष्य में इनके संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी तय एजेंसी द्वारा प्रभावी तरीके से निभाई जाए, ताकि करोड़ों रुपये से तैयार सार्वजनिक सुविधा दोबारा कबाड़ में तब्दील न हो।
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