सीसीएफआई की 63वीं एजीएम में टिकाऊ कृषि, रसायनों के संतुलित इस्तेमाल और निर्यात पर जोर दिया गया। रामनाथ ठाकुर और प्रकाश जावड़ेकर ने रखे विचार।
News Saga Desk
नई दिल्ली। क्रॉप केयर फेडरेशन ऑफ इंडिया (सीसीएफआई) की 63वीं वार्षिक आम बैठक (एजीएम) में टिकाऊ कृषि, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के संतुलित इस्तेमाल, जलवायु परिवर्तन तथा एग्रोकेमिकल उत्पादों के निर्यात को लेकर व्यापक चर्चा हुई। बुधवार को आयोजित इस बैठक में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर और पूर्व केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर सहित कृषि क्षेत्र के कई विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे। बैठक में कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ मिट्टी और मानव स्वास्थ्य की सुरक्षा, नई तकनीक, अनुसंधान एवं विकास तथा भारतीय एग्रोकेमिकल उद्योग की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता मजबूत करने पर विशेष जोर दिया गया।
इस वर्ष सीसीएफआई की 63वीं एजीएम का मुख्य विषय ‘एग्रोकेमिकल्स: कृषि विकास, स्थिरता और निर्यात सुनिश्चित करना’ रहा। इसमें वैज्ञानिकों, उद्योग प्रतिनिधियों, विशेषज्ञों और युवा मुख्य कार्यकारी अधिकारियों ने कृषि क्षेत्र की चुनौतियों और संभावनाओं पर विचार-विमर्श किया।
रसायनों के अनियंत्रित इस्तेमाल पर रामनाथ ठाकुर ने जताई चिंता
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने कृषि में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अनियंत्रित इस्तेमाल पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अधिक उत्पादन हासिल करने की होड़ में रसायनों का बढ़ता उपयोग जमीन और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। उन्होंने ‘कैंसर एक्सप्रेस’ जैसी स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि कृषि से जुड़ी समस्याओं का समाधान केवल बैठकों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसके लिए जमीन पर ठोस कदम उठाने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि स्वस्थ जमीन ही स्वस्थ देश की बुनियाद है। इसलिए कृषि उत्पादन बढ़ाने की कोशिशों में मिट्टी की गुणवत्ता और लोगों के स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उन्होंने उद्योग जगत और वैज्ञानिकों से यह भी विचार करने को कहा कि खेती में कीटनाशकों की जरूरत लगातार क्यों बढ़ रही है।
लैंड आईडी से जरूरत के मुताबिक होगा रसायनों का इस्तेमाल
रामनाथ ठाकुर ने बताया कि सरकार जमीन की डिजिटल पहचान यानी लैंड आईडी तैयार करने की दिशा में काम कर रही है। इसका उद्देश्य जमीन की वास्तविक जरूरत के अनुसार खाद और कृषि रसायनों के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करना है। इससे कृषि संसाधनों के बेहतर उपयोग और खेती से जुड़ी योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिल सकती है।

उन्होंने प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के सरकारी प्रयासों का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, देश के 33 जिलों में 56 लाख किसान करीब 15 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती और रासायनिक खेती के बीच अंतर को समझना जरूरी है। कृषि उद्योग को भी किसानों के हित में व्यावहारिक कदम उठाने चाहिए। सरकार ऐसे प्रयासों पर अपनी क्षमता और आर्थिक स्थिति के अनुरूप विचार करेगी।
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जलवायु परिवर्तन कृषि क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती: जावड़ेकर
पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने जलवायु परिवर्तन को कृषि और एग्रोकेमिकल उद्योग के सामने मौजूद प्रमुख चुनौतियों में शामिल किया। उन्होंने कहा कि बदलते मौसम के कारण पारंपरिक कृषि जलवायु क्षेत्र तेजी से प्रभावित हो रहे हैं। उनके अनुसार, इस वर्ष अल नीनो के कारण कुल वर्षा में करीब 20 प्रतिशत की कमी आई है।
उन्होंने दक्षिण भारत, बिहार और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में मौसम के असंतुलन का उल्लेख करते हुए कहा कि दूसरी ओर राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्रों और कच्छ में असामान्य बारिश हो रही है। कम समय में अत्यधिक वर्षा, बादल फटने और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी घटनाओं से उपजाऊ मिट्टी का नुकसान हो रहा है।
जावड़ेकर ने कहा कि भारत के पास दुनिया की केवल 2.4 प्रतिशत भूमि और चार प्रतिशत ताजे जल संसाधन हैं, जबकि देश को वैश्विक मानव आबादी के 18 प्रतिशत और पशुधन के 18 प्रतिशत हिस्से की जरूरतें पूरी करनी हैं। ऐसे में सीमित संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के लिए टिकाऊ कृषि और नई तकनीक की भूमिका महत्वपूर्ण है।
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