News Saga Desk
रांची | Jharkhand High Court ने मादक पदार्थों से जुड़े मामलों (NDPS) के आरोपी देवेंद्र मुंडा की याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने उनके खिलाफ जारी निरोधात्मक हिरासत (डिटेंशन) आदेश को वैध ठहराते हुए उसमें हस्तक्षेप से साफ इनकार कर दिया। इस फैसले को राज्य में कानून-व्यवस्था के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
समाज के लिए खतरा बताया
मामले की सुनवाई Sujit Narayan Prasad की अध्यक्षता वाली खंडपीठ में हुई। अदालत ने स्पष्ट कहा कि देवेंद्र मुंडा लगातार मादक पदार्थों से जुड़े अपराधों में संलिप्त रहा है और समाज के लिए खतरा बन चुका है। कोर्ट ने माना कि प्रशासन ने सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उचित निर्णय लिया है, इसलिए डिटेंशन आदेश को रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता।
NDPS एक्ट के तहत कई केस
देवेंद्र मुंडा के खिलाफ NDPS Act के तहत कई मामले दर्ज हैं। वर्ष 2018 में Ramgarh जिले के एक मामले में उन्हें दोषी ठहराते हुए 10 साल की सजा सुनाई गई थी। हालांकि बाद में उन्हें जमानत मिल गई, लेकिन उनके खिलाफ गतिविधियां जारी रहीं।
2024 में फिर गिरफ्तारी
जमानत पर बाहर आने के बाद वर्ष 2024 में Chatra जिले के पत्थलगड्डा क्षेत्र में उन्हें 2.2 किलो अफीम के साथ गिरफ्तार किया गया। इस घटना ने उनकी आपराधिक गतिविधियों को एक बार फिर उजागर कर दिया। इन मामलों को आधार बनाते हुए राज्य सरकार ने 14 अक्टूबर 2025 को एक वर्ष के लिए उनके खिलाफ डिटेंशन आदेश जारी किया, जिसे 19 दिसंबर 2025 को पुष्टि भी मिल गई।
याचिका में दी गई दलील
प्रार्थी की ओर से अदालत में कहा गया कि जमानत मिलने के बाद वह किसान के रूप में सामान्य जीवन जी रहा था। उन्होंने यह भी दलील दी कि 17 अक्टूबर 2025 को चतरा के पुलिस अधीक्षक के पत्र के माध्यम से उन्हें डिटेंशन आदेश की जानकारी मिली, जिसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट में इसे चुनौती दी।
कोर्ट ने दलीलें खारिज की
हाईकोर्ट ने प्रार्थी की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि उनके खिलाफ दर्ज मामलों और पिछली गतिविधियों से स्पष्ट है कि वह लगातार अपराध में संलिप्त रहे हैं। ऐसे मामलों में प्रशासन को कठोर कदम उठाने का अधिकार है, ताकि समाज में शांति और सुरक्षा बनी रहे।
कानून-व्यवस्था को लेकर सख्त संदेश
इस फैसले के जरिए हाईकोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि मादक पदार्थों से जुड़े अपराधों के खिलाफ कोई नरमी नहीं बरती जाएगी। अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति बार-बार अपराध में शामिल पाया जाता है, तो उसकी स्वतंत्रता पर अंकुश लगाना समाज के हित में जरूरी हो जाता है।
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