कामारपुकुर में रथयात्रा पर निभाई गई धान रोपण की ऐतिहासिक परंपरा

हुगली के कामारपुकुर में रथयात्रा पर रामकृष्ण मठ के संतों ने श्रीरामकृष्ण परमहंस के परिवार से जुड़ी ऐतिहासिक धान रोपण परंपरा निभाई। जानें इसका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व।

News Saga Desk

कामारपुकुर में रथयात्रा पर धान रोपण की ऐतिहासिक परंपरा एक बार फिर श्रद्धा और आस्था के साथ निभाई गई। पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के गोघाट स्थित कामारपुकुर में गुरुवार को रथयात्रा के पावन अवसर पर कामारपुकुर रामकृष्ण मठ के महराज और साधु-संतों ने ऐतिहासिक लक्ष्मीजला खेत में पारंपरिक विधि-विधान से प्रतीकात्मक धान रोपण किया। यह परंपरा श्रीरामकृष्ण परमहंस के परिवार से जुड़ी हुई है और वर्षों से धार्मिक आस्था तथा कृषि संस्कृति के संगम का प्रतीक मानी जाती है।

श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों की उपस्थिति में आयोजित इस कार्यक्रम ने एक बार फिर बंगाल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को जीवंत कर दिया। कामारपुकुर में रथयात्रा पर धान रोपण की ऐतिहासिक परंपरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि इतिहास, कृषि और आध्यात्मिक परंपरा का अद्भुत संगम है।

श्रीरामकृष्ण परमहंस के परिवार से जुड़ी है यह परंपरा

कामारपुकुर रामकृष्ण मठ एवं मिशन के अध्यक्ष स्वामी लोकोत्तरानंदजी महाराज ने बताया कि श्रीरामकृष्ण परमहंस के पिता खुदीराम चट्टोपाध्याय जब अपने पैतृक गांव से कामारपुकुर आए थे, तब उनके घनिष्ठ मित्र सुखलाल गोस्वामी ने उन्हें लक्ष्मीजला में लगभग दो बीघा भूमि दान स्वरूप प्रदान की थी।

इसी भूमि पर खेती के माध्यम से परिवार की आजीविका की शुरुआत हुई। समय के साथ यह खेत केवल कृषि का केंद्र नहीं रहा, बल्कि परिवार की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का भी हिस्सा बन गया।

रथयात्रा के दिन होती थी पहली धान रोपाई

स्वामी लोकोत्तरानंदजी महाराज के अनुसार, खुदीराम चट्टोपाध्याय प्रत्येक वर्ष रथयात्रा के दिन अपने आराध्य भगवान रघुवीर का स्मरण कर सबसे पहले स्वयं धान की पौध रोपते थे। इसके बाद गांव के किसान पूरे खेत में धान की रोपाई का कार्य प्रारंभ करते थे।

इस खेत की उपज से पूरे परिवार का वर्षभर भरण-पोषण होता था। यही कारण है कि कामारपुकुर में रथयात्रा पर धान रोपण की ऐतिहासिक परंपरा को आज भी अत्यंत श्रद्धा के साथ निभाया जाता है।

रामकृष्ण मठ ने संभाली विरासत

खुदीराम चट्टोपाध्याय के निधन के बाद इस परंपरा को समाप्त नहीं होने दिया गया। कामारपुकुर रामकृष्ण मठ ने इस विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया और तभी से प्रत्येक वर्ष रथयात्रा के अवसर पर मठ के महराज एवं साधु-संत प्रतीकात्मक रूप से धान रोपकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

इस वर्ष भी धार्मिक अनुष्ठानों के बीच संतों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए धान की पौध रोपी। कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु और स्थानीय ग्रामीण मौजूद रहे।

धार्मिक आस्था और कृषि संस्कृति का संगम

कामारपुकुर में रथयात्रा पर धान रोपण की ऐतिहासिक परंपरा केवल एक धार्मिक रस्म नहीं है। यह बंगाल की कृषि परंपरा, ग्रामीण जीवन और आध्यात्मिक विरासत का जीवंत उदाहरण भी है। इस आयोजन के माध्यम से नई पीढ़ी को यह संदेश दिया जाता है कि खेती केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

रथयात्रा जैसे पावन अवसर पर धान रोपण का यह आयोजन प्रकृति, श्रम और आध्यात्मिक जीवन के बीच गहरे संबंध को भी दर्शाता है।

पृष्ठभूमि

कामारपुकुर में रथयात्रा पर धान रोपण की ऐतिहासिक परंपरा

कामारपुकुर श्रीरामकृष्ण परमहंस की जन्मस्थली के रूप में विश्वभर में प्रसिद्ध है। यहां स्थित रामकृष्ण मठ और मिशन से जुड़े धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहते हैं। लक्ष्मीजला खेत श्रीरामकृष्ण परमहंस के परिवार के इतिहास से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है, जहां आज भी सदियों पुरानी परंपरा को जीवित रखा गया है।

समाज और संस्कृति पर प्रभाव

इस प्रकार के आयोजन समाज को अपनी ऐतिहासिक विरासत और सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने का कार्य करते हैं। साथ ही यह कृषि के महत्व, श्रम के सम्मान और धार्मिक परंपराओं के संरक्षण का संदेश भी देते हैं। स्थानीय लोगों के लिए यह आयोजन आस्था के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करने का अवसर भी बनता है।

आधिकारिक जानकारी

कामारपुकुर रामकृष्ण मठ एवं मिशन के अध्यक्ष स्वामी लोकोत्तरानंदजी महाराज ने बताया कि यह परंपरा श्रीरामकृष्ण परमहंस के पिता खुदीराम चट्टोपाध्याय के समय से चली आ रही है। मठ हर वर्ष रथयात्रा के अवसर पर प्रतीकात्मक धान रोपण कर इस ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित करता है।

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जनता के लिए जानकारी

रथयात्रा के अवसर पर आयोजित यह परंपरा श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र होती है। मठ प्रशासन ने श्रद्धालुओं से धार्मिक गरिमा बनाए रखने और परंपराओं के सम्मान के साथ कार्यक्रम में सहभागिता करने की अपील की है।

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