IGR रिपोर्ट में तीन लोग दोषी, पार्थ पवार का नाम नहीं
पुणे के मुंधवा-कोरेगांव पार्क स्थित 40 एकड़ की जमीन के विवादित सौदे ने महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा भूचाल ला दिया है। आरोप है कि इस जमीन की बाजार कीमत लगभग 1800 करोड़ रुपये थी, लेकिन इसे मात्र 300 करोड़ रुपये में बेच दिया गया। विवाद तब और बढ़ गया जब यह बात सामने आई कि यह जमीन महार वतन श्रेणी की थी, यानी इसकी खरीद-बिक्री सरकार की अनुमति के बिना कानूनी रूप से संभव ही नहीं थी। इस डील में उपमुख्यमंत्री अजित पवार के बेटे पार्थ पवार से जुड़ी कंपनी का नाम आने से यह मामला लगातार सुर्खियों में बना हुआ है।
अब इस केस में IGR (Inspector General of Registration) की तीन सदस्यीय जांच समिति की रिपोर्ट सामने आ चुकी है। रिपोर्ट ने बड़े पैमाने पर अनियमितताओं की पुष्टि की है और तीन लोगों को दोषी ठहराया है, लेकिन पार्थ पवार का नाम जांच में नहीं आया है। यह मामला अब प्रशासन, पुलिस, राजस्व विभाग और उच्च स्तरीय सरकारी समितियों की एक साथ चल रही जांच के अधीन है। इस विवाद में कानून, इतिहास, पुलिस कार्रवाई, राजनीति और प्रशासनिक लापरवाही सब कुछ शामिल है।
सौदा कैसे हुआ और विवाद कैसे शुरू हुआ?
मई 2025 में अमादिया एंटरप्राइजेज LLP नाम की कंपनी ने मुंधवा इलाके की 40 एकड़ जमीन खरीदी। कागजों में इस जमीन की कीमत 300 करोड़ रुपये दर्ज की गई और मात्र 500 रुपये की स्टांप ड्यूटी जमा की गई।
यही से विवादों की शुरुआत हुई, क्योंकि जमीन की वास्तविक बाजार कीमत 1700–1800 करोड़ रुपये के बीच मानी जाती है। इस सौदे पर करीब 21 करोड़ रुपये की स्टांप ड्यूटी लगनी चाहिए थी, जो नहीं ली गई। जमीन महार वतन श्रेणी की थी, जिसकी बिक्री सरकार की अनुमति के बिना प्रतिबंधित है। क्योंकि 1988 में जमीन बॉटेनिकल सर्वे ऑफ इंडिया को 50 साल के पट्टे पर सरकार ने दिया था, यानी जमीन सरकारी नियंत्रण में थी।
सामाजिक कार्यकर्ता विजय कुंभार और अंजलि दमानिया ने इस सौदे के दस्तावेज सोशल मीडिया पर साझा किए। यहीं से मामला सार्वजनिक हुआ और राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गया।
महार वतन जमीन क्या होती है?
महाराष्ट्र में वतनदारी प्रथा सदियों पुरानी व्यवस्था है, जिसमें सामाजिक और प्रशासनिक कार्यों के बदले समुदायों को जमीन दी जाती थी। महार समुदाय के पास जो वतन की जमीनें थीं, उन पर खेती तो की जा सकती थी, लेकिन इन्हें बेचा नहीं जा सकता था। 1958 में वतनदारी प्रथा समाप्त कर दी गई और ये जमीनें सरकार के नियंत्रण में चली गईं। 1963 में कुछ जमीनें पुराने परिवारों को वापस दी गईं, लेकिन स्पष्ट शर्तों के साथ जमीन का मालिकाना हक सीमित रहेगा। गैर-कृषि उपयोग के लिए सरकार की पूर्व अनुमति आवश्यक है। नियमों के उल्लंघन पर जमीन जब्त की जा सकती है। इसलिए मुंधवा की 40 एकड़ जमीन पूरी तरह से सरकारी श्रेणी में मानी जाती है और इसकी बिक्री अवैध है।
FIR दर्ज लेकिन पार्थ पवार का नाम क्यों नहीं?
मामले के सार्वजनिक होने के बाद बावधान पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज की गई। FIR में तीन लोगों को आरोपी बनाया गया । जिसमें सब-रजिस्ट्रार रविंद्र तारू,. दिग्विजय पाटिल (अमादिया कंपनी की ओर से हस्ताक्षरकर्ता, और पार्थ पवार के रिश्तेदार), शीतल तेजवानी (पावर ऑफ अटॉर्नी धारक) आरोपी है।
FIR में पार्थ पवार का नाम इसलिए नहीं है क्योंकि उनका नाम किसी भी खरीद-बिक्री दस्तावेज, रजिस्ट्रेशन पेपर, 7/12 उतारे या प्रतिनिधित्व संबंधी कागजों में नहीं पाया गया।
IGR रिपोर्ट में क्या सामने आया?
IGR राजेंद्र मुठे की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय समिति ने अपनी रिपोर्ट IGR रवींद्र बिनवाडे को सौंप दी, जिसे आगे पुणे के विभागीय आयुक्त चंद्रकांत पुलकुंडवार को भेजा गया।
रिपोर्ट के मुख्य बिंदु
- पार्थ पवार किसी दस्तावेज में हस्ताक्षरकर्ता या प्रतिनिधि नहीं हैं, इसलिए उन्हें आरोपी नहीं माना जा सकता।
- सब-रजिस्ट्रार रविंद्र तारू ने गलत जानकारी के आधार पर रजिस्ट्रेशन किया।
- दिग्विजय पाटिल और शीतल तेजवानी की भूमिका संदिग्ध और कानूनी रूप से दोषपूर्ण पाई गई।
- जमीन सरकारी थी, इसलिए रजिस्ट्रेशन होना ही नहीं चाहिए था।
- 21 करोड़ की स्टांप ड्यूटी माफी नियमों के खिलाफ थी।
जांच समिति ने यह भी माना कि जमीन की प्रकृति और सरकारी स्वामित्व को जानबूझकर छिपाया गया।
कंपनी को 42 करोड़ का नोटिस
IGR कार्यालय ने सौदा रद्द होने के बाद अमादिया एंटरप्राइजेज को 42 करोड़ रुपये स्टांप ड्यूटी जमा करने का नोटिस जारी किया है। कंपनी ने जवाब देने के लिए 15 दिन मांगे थे, लेकिन विभाग ने केवल 7 दिन दिए।
आगे क्या होगा?
यह सिर्फ IGR की रिपोर्ट है। बाकी तीन जांचें अभी बाकी हैं:
- राजस्व विभाग की जांच रिपोर्ट
- सेटलमेंट कमिश्नर की रिपोर्ट
- छह सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति की संयुक्त रिपोर्ट
अगर अनियमितताएं साबित होती हैं, तो सरकार जमीन जब्त कर सकती है, FIR में नए नाम जुड़ सकते हैं, और आर्थिक अपराध शाखा (EOW) व ED जांच भी शुरू हो सकती है।
उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने इस मामले से दूरी बनाते हुए कहा कि उनका सौदे से कोई संबंध नहीं है। वहीं मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा है कि मामले की गहन जांच की जाएगी और अगर कोई अनियमितता पाई गई तो कार्रवाई होगी। राजस्व विभाग और सेटलमेंट कमिश्नर की रिपोर्टें भी जल्द आने वाली हैं। इसके बाद छह सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति अंतिम जांच रिपोर्ट सौंपेगी, जिसके आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी।
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