अंश-अंशिका मामला: पुलिस और आरपीएफ की कार्यप्रणाली पर सवाल

News Saga Desk

रांची: घर से तीन किलोमीटर के दायरे में पांच दिन तक मौजूद रहे बच्चे, 12 दिन तक पुलिस और आरपीएफ को नहीं मिला कोई सुराग, धुर्वा थाना क्षेत्र के मौसीबाड़ी खटाल इलाके से अगवा किए गए मासूम अंश और अंशिका को अपहरण के 13 दिन बाद बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने सकुशल खोज निकाला। इसके बाद झारखण्ड पुलिस ने इसे अपनी बड़ी सफलता के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की, लेकिन इस पूरे मामले ने पुलिस और रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स (आरपीएफ) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

हकीकत यह है कि यह मामला केवल सुरक्षा व्यवस्था की विफलता ही नहीं, बल्कि पुलिस तंत्र की संवेदनहीनता और लापरवाही को भी उजागर करता है।

 

तीन किलोमीटर के भीतर रहे बच्चे, फिर भी हाथ खाली रही पुलिस

जानकारी के अनुसार, अंश और अंशिका अपहरण के बाद शुरुआती पांच दिनों तक रांची में ही मौजूद थे। वे अपने घर से मात्र तीन किलोमीटर के दायरे में रखे गए थे, इसके बावजूद रांची पुलिस और आरपीएफ उन्हें तलाशने में पूरी तरह विफल रही।

पुलिस ने दावा किया था कि बच्चों की खोज के लिए करीब 500 सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली गई और लगभग 5,000 वाहनों की जांच की गई। इसके बावजूद कोई ठोस सुराग हाथ नहीं लगा। रिपोर्ट के मुताबिक, अपहरण के दो दिन बाद ही आरोपी बच्चों को लेकर हटिया स्टेशन पहुंच गए थे और स्टेशन के पास ही तीन दिनों तक उन्हें छिपाकर रखा।

विडंबना यह रही कि इसी दौरान पुलिस हटिया और रांची रेलवे स्टेशन के साथ-साथ बस अड्डों पर लगातार तलाशी अभियान चला रही थी, लेकिन बच्चे पुलिस की नजरों से ओझल रहे। इससे पुलिस के खुफिया तंत्र और समन्वय पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग गए हैं।

शक के आधार पर गरीब दुकानदार का जीवन तबाह

इस मामले में पुलिस की संवेदनहीनता का सबसे भयावह चेहरा तब सामने आया, जब संदेह के आधार पर एक गरीब दुकानदार और उसके परिवार को बेरहमी से प्रताड़ित किया गया। जिस मल्लार कोचा इलाके से अंश और अंशिका लापता हुए थे, वहीं रितेश नामक युवक एक छोटी सी किराना दुकान चलाता है।

परिजनों ने पुलिस को बताया था कि बच्चे पैसे लेकर दुकान से सामान खरीदने गए थे। इसी आधार पर पुलिस ने यह मान लिया कि दुकानदार का कोई बच्चा नहीं है, इसलिए उसी पर संदेह जताया गया। बिना ठोस सबूत के पुलिस ने 7 जनवरी को रितेश, उसके माता-पिता और पत्नी को घर से उठाकर थाने ले गई।

रितेश ने बताया कि उसके माता-पिता और पत्नी को दो दिनों तक थाने में रखा गया, जबकि उसे और कूड़ा बीनने वाले मल्लार समुदाय के एक व्यक्ति को छह दिनों तक हिरासत में रखा गया। इस दौरान पुलिस ने उसके साथ बुरी तरह मारपीट की।

मारपीट के बाद दोनों कान से सुनाई देना बंद

रितेश ने बताया कि पुलिस की पिटाई इतनी बर्बर थी कि उसके दोनों कान के पीछे खून जम गया। हालत यह हो गई कि अब उसे दोनों कानों से सुनाई देना बंद हो गया है।

यह घटना न केवल पुलिस की क्रूरता का उदाहरण है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि किस तरह बिना जांच-पड़ताल के गरीब और कमजोर वर्ग को निशाना बनाया जाता है। अंश-अंशिका मामला अब सिर्फ अपहरण की घटना नहीं रह गया है, बल्कि यह झारखण्ड में कानून व्यवस्था, जांच प्रणाली और मानवीय संवेदनाओं पर एक गंभीर सवाल बनकर खड़ा हो गया है।

 

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