News Saga Desk
रांची | Jharkhand High Court ने पुलिस हिरासत में प्रताड़ना के एक गंभीर मामले पर सख्त रुख अपनाते हुए स्वत: संज्ञान लिया है। चीफ जस्टिस M. S. Sonak और जस्टिस Rajesh Shankar की खंडपीठ ने इस मामले को जनहित याचिका के रूप में सुनते हुए राज्य प्रशासन से कई अहम सवाल किए। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि हिरासत में मानवाधिकारों का उल्लंघन किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं है।
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने सरायकेला के एसपी से पूछा कि राज्य के पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने को लेकर अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए हैं। अदालत ने यह भी जानने की कोशिश की कि क्या हिरासत में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए Supreme Court of India के दिशा-निर्देशों का पालन किया जा रहा है या नहीं। कोर्ट के सवालों से साफ है कि निगरानी व्यवस्था की कमी को गंभीरता से लिया जा रहा है।
अदालत ने स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव को भी तलब करते हुए निर्देश दिया कि वे यह स्पष्ट करें कि पीड़ित Tarun Mahto को “फिट फॉर कस्टडी” का प्रमाण पत्र देने वाले चिकित्सक के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है। कोर्ट ने कहा कि हिरासत में किसी व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति का सही आकलन करना डॉक्टर की जिम्मेदारी है और इसमें लापरवाही गंभीर परिणाम दे सकती है।
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि पीड़ित Tarun Mahto को 1.50 लाख रुपये का मुआवजा दिया जा चुका है। हालांकि कोर्ट ने साफ किया कि उसका उद्देश्य केवल मुआवजा नहीं, बल्कि पूरे मामले में जवाबदेही तय करना है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
यह मामला 19 नवंबर 2025 की रात का है, जब ईचागढ़ पुलिस Tarun Mahto को हिरासत में लेकर गई थी। आरोप है कि थाने में उसकी बेरहमी से पिटाई की गई। इसके बाद पीड़ित की पत्नी ने चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर न्याय की गुहार लगाई, जिसे आधार बनाकर हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया और इसे जनहित याचिका के रूप में दर्ज किया।
खंडपीठ ने सभी संबंधित अधिकारियों को अगली सुनवाई तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस मामले की अगली सुनवाई 18 जून को निर्धारित की गई है। अब यह देखना अहम होगा कि प्रशासन अदालत के सवालों का क्या जवाब देता है और आगे क्या कार्रवाई होती है।
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