भू-धंसाव से नैनीताल में माल रोड खतरे में!

News Saga Desk

कुछ दिन पहले नैनीताल की प्रसिद्ध माल रोड की सहायक सड़क ‘निचली माल रोड’ का एक बड़ा हिस्सा झील की ओर धंस गया है। कई मीटर लंबे हिस्से में दरारें आ गई हैं। निचली माल रोड में हुए भू-धंसाव के चलते इस हिस्से से लगी मुख्य मालरोड की सुरक्षा को लेकर भी आशंकाएं व्यक्त की जाने लगी हैं। सुरक्षा के मद्देनजर लोअर माल रोड के प्रभावित हिस्से में वाहनों की आवाजाही पर पाबंदी लगा दी गई है। विशेषज्ञ संस्थानों की सलाह -मशविरे के आधार पर लोक निर्माण विभाग (लोनिव) प्रभावित हिस्से के स्थायी सुरक्षा प्रबंध में जुट गया है। ज्ञातव्य है कि 2018 में भी इस क्षेत्र का करीब पच्चीस मीटर लंबा हिस्सा झील की ओर धंस गया था। लोक निर्माण विभाग ने लाखों रुपए खर्च कर क्षतिग्रस्त हिस्से में नई सुरक्षा दीवार बनाई थी, जो अल्पजीवी साबित हुई।

नैनीताल की निचली माल रोड ब्रिटिश शासनकाल में अंग्रेजों द्वारा झील के चारों ओर बनाई गई पत्थरों की दीवार पर टिकी हुई है। ब्रिटिश शासनकाल में इस सड़क का उपयोग सामान ढोने वाले कुलियों के लिए किया जाता था। कुलियों द्वारा ढोई जाने वाली सामग्री मुख्य माल रोड में हवाखोरी करने वालों से टकरा न जाए, इससे बचने के लिए अंग्रेजों ने यह व्यवस्था बनाई थी। तब बोझ के साथ कोई भी कुली मुख्य माल रोड पर नहीं चल सकता था। नैनीताल की माल रोड का ग्रांड होटल से पुस्तकालय तक का हिस्सा भू- धंसाव के लिहाज से प्रारंभिक काल से ही संवेदनशील रहा है। इस क्षेत्र में जमीन के धंसने और दरारें आने का इतिहास बहुत पुराना है। 1889 में झील के पूर्वी छोर में अवस्थित तबके हैरिस होटल के पास एक छोटा भू-स्खलन हुआ था।

इस भू-स्खलन की जांच भारतीय भू-गर्भ सर्वेक्षण के तत्कालीन उपाधीक्षक आर.डी. ओल्डहैम ने की थी। इस बारे में ओल्डहैम ने 21 सितंबर,1889 को अपनी जांच रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। 26 जनवरी,1895 को कुमाऊं के तत्कालीन कमिश्नर लेफ्टिनेंट कर्नल ई. ई. ग्रीज ने अपने मुआयने के दौरान ग्रांड होटल से इलाहाबाद बैंक परिसर (उन दिनों इलाहाबाद बैंक माल रोड में था) में दरारें देखने की बात कही थी। 16 फरवरी, 1895 को पीडब्ल्यूडी के तत्कालीन अधिशासी अभियंता कर्नल फुलफोर्ड ने मालरोड में आई दरारों का मुआयना कर इस संबंध में चीफ इंजीनियर को रिपोर्ट भेजी थी। माल रोड में आई इन दरारों के मद्देनजर सरकार ने 24 मार्च,1895 को मिडिल माल रोड का निर्माण कार्य रोक दिया था।

1895 में ग्रांड होटल एवं बैंक हाउस के पीछे स्थित दीवारों में दरारें आईं। सरकार ने भू-वैज्ञानिक मिस्टर गिल्स से इन दरारों के कारणों की जांच कराई थी। 1916 में इलाहाबाद बैंक की दीवार ढह गई थी। 1921 में बैंक हाउस के पास पहाड़ी धंसी। जिस दौर में माल रोड में भू- धंसाव की ये घटनाएं घटीं, तब माल रोड सहित संपूर्ण नैनीताल यांत्रिक यातायात से बिल्कुल अछूता था। आज जबकि नैनीताल में इंसानों के साथ दोपहिया और चौपहिया वाहनों का भी रेला उमड़ने लगा है। इंसानों और वाहनों की बेतहाशा भीड़ के चलते नगर की सांसें थम- सी गईं हैं। लोअर माल रोड एवं मुख्य माल रोड सहित नगर की सभी सड़कें -गलियां अपनी क्षमता से कई गुना अधिक वाहनों का बोझ ढो रही हैं। नगर का हरेक कोना और पैदल रास्ते गाड़ियों से पट गए हैं। वाहनों की बेतहाशा भीड़ से पैदल आवागमन भी बाधित हो रहा है।

सुंदर प्राकृतिक झील, अनुपम सौंदर्य और स्वास्थ्यवर्धक जलवायु के मद्देनजर 182 वर्ष पूर्व अंग्रेजों ने नैनीताल नगर की बसावट शुरू की थी। औपनिवेशिक शासक नैनीताल की तुलना यूरोपीय देशों से करते थे। नैनीताल का स्वच्छ और शुद्ध वातावरण एवं आबोहवा को अच्छे स्वास्थ्य के लिए आदर्श माना जाता था। अंग्रेजी शासनकाल में नैनीताल को ‘कंट्री रिट्रीट’ कहा जाता था। अंग्रेज यहां के पारिस्थितिक एवं पर्यावरण का विशेष खयाल रखते थे। तब नैनीताल की सुंदरता, शांति और सुरक्षा, विश्व विख्यात थी। आज ये सभी खतरे में हैं। नैनीताल की बसासत के प्रारंभिक चरण में यहां आने-जाने के पैदल या घोड़ा-डांडी अकेले साधन थे। 24 अक्टूबर, 1884 को काठगोदाम रेल यातायात से जुड़ गया। इससे पहले नैनीताल नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेज आगरा एंड अवध की ग्रीष्मकालीन राजधानी बन गया था। तब नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेज के सर्वशक्तिमान ओहदेदार लेफ्टिनेंट गवर्नर, प्रांत के आला अधिकारी समेत सभी कारकुन काठगोदाम से घोड़े की सवारी अथवा पैदल नैनीताल आया करते थे। कालांतर में ब्रेबरी तक तांगे आने लगे। ब्रेबरी से घोड़ों में बैठकर अथवा पैदल नैनीताल आया जा सकता था।

1893 में नैनीताल तक तांगे पहुंच गए थे। अविभाजित भारत के सबसे बड़े ओहदेदार वॉयसरॉय, नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेज के लेफ्टिनेंट गवर्नर, सेना और प्रशासन के आला अफसरान तांगों में बैठकर नैनीताल आते थे। नैनीताल की बसावट के करीब सात दशक बाद 1915 में यहां मोटर सड़क पहुंची। तब तक नैनीताल विश्व मानचित्र में अपना विशिष्ट स्थान बना चुका था। मोटर मार्ग बनने के बाद काठगोदाम से नैनीताल तक मोटर लॉरी चलने लगी थी। नैनीताल मोटर ट्रांसपोर्ट कंपनी मोटर लॉरियों का संचालन करती थी। मोटर लॉरी तल्लीताल तक ही आ सकती थी। 1925 तक नैनीताल मोटर ट्रांसपोर्ट कंपनी के पास 88 लॉरियां थीं। नैनीताल के लचीले एवं भंगुर पर्यावरण और स्थानीय विशिष्टाओं के मद्देनजर नगर के भीतर यांत्रिक यातायात नहीं था। डांडी, झम्पानी, घोड़े और हाथ रिक्शा ही यातायात के एकमात्र मुख्य साधन थे। लेफ्टिनेंट गवर्नर समेत सभी अंग्रेज हुक्मरान और उनके परिजन नगर के भीतर हाथ रिक्शा और घोड़ों की सवारी किया करते थे। माल रोड और नगर के भीतरी हिस्सों में साइकिल चलाने पर भी सख्त पाबंदी थी। नगर के बाहरी हिस्से में साइकिल चलाने के लिए नगर पालिका से लाइसेंस लेना अनिवार्य था। कार्ट रोड (नैनीताल-हल्द्वानी मार्ग) और डिपो रोड ( नैनीताल-भवाली मार्ग) में ही साइकिल चलाने की इजाजत दी जाती थी।

1901 में जब नैनीताल की ग्रीष्मकालीन आबादी 7609 थी, सिर्फ 520 बंगले और दूसरे मकानात थे, तभी नैनीताल के भार वहन क्षमता की बात होने लगी थी। अंग्रेज नैनीताल के नाजुक पर्यावरण के मद्देनजर यहां निश्चित सीमा से अधिक आबादी को बसाने के सख्त खिलाफ थे। कुमाऊं के तत्कालीन कमिश्नर कैप्टन ए. डब्ल्यू. इबट्सन ने 19 जुलाई, 1929 को नगर पालिका, नैनीताल की वार्षिक रिपोर्ट में लिखी एक टिप्पणी में कहा था- ” इस समय नैनीताल की एक स्वास्थ्यप्रद नगर की छवि है पर भविष्य में इस छवि को बनाए रखने में कुछ जटिल समस्याएं नजर आ रही हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह नगर अति इंसानों से भर गया है।” जब कैप्टन इबट्सन ने यह टिप्पणी की उस दौर में नैनीताल की आबादी करीब बारह हजार थी। 1937 में नगर पालिका ने नैनीताल की मालरोड में नियंत्रित यांत्रिक यातायात की अनुमति प्रदान कर दी। तब नगर पालिका के अध्यक्ष या सचिव की पूर्वानुमति से विशेष परिस्थितियों में तल्लीताल से सचिवालय (वर्तमान उत्तराखंड उच्च न्यायालय) तक ही वाहन आ-जा सकते थे। 1938 में नगर पालिका ने माल रोड में वाहनों की अधिकतम गति सीमा दस मील प्रति घंटा तय कर दी थी। तब निचली माल रोड में गाड़ियों के चलने पर कठोर पाबंदी थी।

माल रोड में यांत्रिक यातायात की अनुमति दिए हुए दो साल भी नहीं बीते थे भू-वैज्ञानिकों ने माल रोड के अतिरिक्त अन्य स्थानों में वाहनों की आवाजाही का विरोध करना प्रारंभ कर दिया था। भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के तत्कालीन अधीक्षक ए. एल. कॉल्सन ने 5 अगस्त, 1939 की अपनी एक रिपोर्ट में नैनीताल नगर के भीतर वाहनों की आवाजाही पर पाबंदी लगाने की सिफारिश की। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा “… तल्लीताल से सचिवालय तक गाड़ियां तो जाती हैं। पर इसके अलावा नगर के बाकी इलाकों में वाहनों की आवाजाही पहाड़ियों की सुरक्षा की दृष्टि से हानिकारक है। भारी वाहनों की आवाजाही से नगर की सुरक्षा एवं स्थिरता खतरे में पड़ सकती है।… गाड़ी चलाने वालों को खुद पैदल चलकर पदयात्रियों की तकलीफों को महसूस करना चाहिए।” इसके बाद माल रोड में वाहनों की आवाजाही को हतोत्साहित करने की दृष्टि से लेक ब्रिज शुल्क की व्यवस्था की गई। अब यह व्यवस्था नगर पालिका की आमदनी का मुख्य स्रोत बन गई है।

1947 में भारत आजाद हो गया। अंग्रेज अपने वतन लौट गए। संरक्षणवादी नीतियों को भी वे अपने साथ ले गए। आजादी के करीब दो दशकों तक मामूली शिथिलताओं के साथ ब्रिटिशकालीन व्यवस्थाओं का अक्स बना रहा। उस दौर के जनप्रतिनिधियों ने नगर की सुरक्षा, सुंदरता और शांति के मामले में समझौता नहीं किया। 1960 के दशक में माल रोड में यांत्रिक यातायात नहीं के बराबर था। राजभवन को छोड़कर माल रोड के अलावा नगर के अन्य हिस्सों में गाड़ियों का संचालन प्रतिबंधित था। उस दौर के जनप्रतिनिधियों को मालरोड में एक भी वाहन का गुजरना नामंजूर था। नगर पालिका के तत्कालीन सदस्य चन्द्रलाल साह द्वारा 5 दिसंबर,1966 को बोर्ड की बैठक में प्रस्तुत प्रस्ताव संख्या-दो के जरिए माल रोड में कार और भारी वाहनों के चलने पर पाबंदी लगाने की मांग की थी। यह प्रस्ताव स्थगित हो गया था।

1980 के दशक तक भी नगर में यांत्रिक यातायात नियंत्रित संख्या में था। यहां हवाखोरी को आने वाले अधिकांश सैलानी पैदल टहलना पसंद करते थे। देश के शीर्ष राजनेताओं को भी पैदल चलने में संकोच नहीं होता था। वीआईपी कल्चर इस कदर हावी नहीं था। मारुति संस्कृति आने के बाद नैनीताल का पूरा परिदृश्य बदल गया। नैनीताल नगर में मोटर मार्ग बाजार क्षेत्र, अश्व मार्ग और पैदल मार्ग सहित सड़कों की कुल लंबाई करीब एक सौ किलोमीटर के आसपास है। इसमें वाहन चालित सड़कों के रूप में मान्य सड़कों की लंबाई करीब 18 किलोमीटर है। बाकी पैदल मार्ग हैं। एक मोटे अनुमान के अनुसार नैनीताल में निजी एवं टैक्सी चौपहिया वाहनों की संख्या करीब साढ़े तीन हजार है। यहां मकानों की संख्या करीब साढ़े नौ हजार के आसपास पहुंच गई है। हरेक चौथे-पांचवें परिवार के पास दोपहिया वाहन हैं। टैक्सी बाइक और टैक्सी स्कूटी की कोई गिनती ही नहीं है। नगर में टैक्सी बाइक अनगिनत संख्या में दौड़ रहे हैं। पर्यटक सीजन के दिनों में प्रशासन द्वारा निश्चित संख्या में ही पर्यटक वाहनों को नगर में प्रवेश की आज्ञा दी जाती है। बावजूद इसके पीक सीजन में प्रतिदिन करीब ढाई- तीन हजार पर्यटकों के वाहन नैनीताल आते हैं। नतीजतन अब नगर की कोई सड़क, पैदल मार्ग और बटिया दोपहिया और चौपहिया वाहनों से निरापद नहीं है। सभी सड़कों, रास्तों और बाजारों में भी धड़ल्ले से वाहन दौड़ रहे हैं।

अनियंत्रित, अनियोजित एवं अदूरदर्शी विकास ने स्वप्नलोक को एक अव्यवस्थित और अति भीड़भाड़ वाले नगर में बदल दिया है। इंतजामिया नैनीताल नगर की भार वहन क्षमता का आकलन कर तद्नुसार गाड़ियों की संख्या नियंत्रित करने के बजाय पार्किंग बनाने पर जोर दे रहे हैं। पार्किंग के लिए नैनीताल में ब्रिटिशकाल में निर्मित नालों में लिंटर डाले जा रहे हैं। जिससे नालों का वजूद और औचित्य पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग गया है। आज जबकि नैनीताल जैसे हिल स्टेशन में इंसानों के पैदल चलने के लिए सड़कें नहीं बची हैं, दिन प्रतिदिन गाड़ियों की बढ़ती तादाद के लिए आखिर सड़कें आएंगी कहां से? जब गाड़ियों के चलने के लिए सड़कें ही नहीं होंगीं, तो पार्किंग बनाने का क्या लाभ? लोक निर्माण विभाग के अधिशासी अभियंता रत्नेश सक्सेना के मुताबिक निचली मालरोड के क्षतिग्रस्त हिस्से के स्थायी बचाव के लिए लोनिवि ने विशेषज्ञ संस्थानों की निगरानी एवं सलाह पर 3.80 करोड़ रुपये का प्रस्ताव तैयार किया है। मालरोड में वाहनों के अत्यधिक बोझ को कम किए बगैर प्रस्तावित योजना के पूर्ण हो जाने के बाद भी इस क्षेत्र में भू- धंसाव रुक जाएगा, यह कहना फिलवक्त मुश्किल है।


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