पाकिस्तान की आर्थिक नाकामी फिर उजागर, विश्‍व को भारत की चेतावनी सही निकली

News Saga Desk

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की सात अरब डॉलर की विस्तारित फंड सुविधा (ईएफएफ) के तहत पाकिस्तान के लिए मंज़ूर पैकेज की दूसरी समीक्षा ने एक बार फिर उस सच्चाई को सामने रख दिया है, जिसे भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर रेखांकित करता आ रहा है कि पाकिस्तान की आर्थिक संरचना इतनी जर्जर और राजनीतिक एवं सैन्य हितों से बंधी हुई है कि कोई भी वित्तीय मदद वहां स्थायी सुधार का रूप नहीं ले पाएगी। बीते सात दशकों में यह बार-बार साबित हुआ है कि बेलआउट पैकेज उस देश के लिए स्थायी समाधान नहीं हैं, जहां नीतिगत स्थिरता की कमी हो और आर्थिक प्राथमिकताएं राजनीतिक और सैन्य हितों से संचालित हों।

भारत का यह कहना कि पाकिस्तान आईएमएफ फंड का इस्तेमाल सैन्य गतिविधियों और सीमापार आतंकवाद में कर सकता है, केवल राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि ऐतिहासिक अनुभव पर आधारित चेतावनी है। जब रक्षा बजट साल-दर-साल बढ़ रहा हो और शिक्षा-स्वास्थ्य पर खर्च घट रहा हो, तो यह साफ है कि विकास प्राथमिकता सूची में नीचे है। पाकिस्तान ने अब तक लगभग 25 बार (1958 से) आईएमएफ की सहायता ली है, जो दुनिया में किसी भी अन्य देश की तुलना में बहुत अधिक है। यह एक पैटर्न बन चुका है, बेलआउट, सुधार की घोषणा, फिर गिरावट। मई 2025 में जब आईएमएफ के बोर्ड की बैठक में पाकिस्तान को 2.3 बिलियन डॉलर की मंजूरी दी गई, तो भारत ने मतदान से दूर रहते हुए इस मदद पर आपत्ति जताई थी।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक में भारत के स्थायी प्रतिनिधि प. हरिश ने पाकिस्तान को ‘आईएमएफ का बार-बार कर्ज लेने वाला देश’ बताकर उसकी आर्थिक नीति की स्थिरता पर सवाल उठाए, और पाकिस्तान की आर्थिक असफलताओं को आतंक तथा कट्टरता से जोड़कर पेश किया। वस्‍तुत: भारत ने जो पाकिस्‍तान को लेकर आईएमएफ को चेताया और पूरी दुनिया को उसका सच दिखाया था, वह आज एक बार फिर से सच साबित हुआ है। हालिया समीक्षा में पाकिस्तान पांच में से तीन लक्ष्यों को हासिल करने में नाकाम रहा, जो अपने आप में आईएमएफ की शर्तों और पाकिस्तान की नीतिगत प्रतिबद्धताओं के बीच की गहरी खाई को उजागर करता है। पाकिस्तानी वित्त मंत्रालय की ‘फाइनेंशियल ऑपरेशंस समरी’ इस असफलता की पुष्टि करती है।

यहां ध्‍यान आता है वह समय जब आईएमएफ की पिछली बैठक में भारत के प्रतिनिधि परमेश्वरन अय्यर ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि वैश्विक वित्तीय संस्थानों को अपनी प्रक्रियाओं में नैतिक मूल्यों को प्राथमिकता देनी चाहिए, विशेषकर उन मामलों में जहाँ सहायता प्राप्त करने वाला देश सैन्य गतिविधियों और सीमा पार आतंकवाद में संलिप्त रहा हो, वहां किसी भी प्रकार की आर्थ‍िक सहायता या ऋण को मंजूरी नहीं देनी चाहिए। भारत की चिंता केवल आर्थिक नहीं है; उसका मानना है कि पाकिस्तान को मिलने वाली वित्तीय मदद का एक हिस्सा अप्रत्यक्ष रूप से उसकी सैन्य क्षमताओं को मज़बूत करता है, जिससे आतंकवाद को बढ़ावा मिलता है।

विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने भी इसी संदर्भ में कहा कि जो देश पाकिस्तान को बार-बार बेलआउट दे रहे हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि केवल वित्तीय सहायता देकर उसके मूल संकट का समाधान संभव नहीं है, जब तक कि उसकी नीतिगत और सुरक्षा-संबंधी दिशा में मूलभूत परिवर्तन न हो। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने तो और भी कड़े शब्दों में कहा था कि आईएमएफ की यह सहायता आतंक के लिए अप्रत्यक्ष वित्तपोषण साबित हो सकती है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस जोखिम को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। साथ ही वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने चिंता जताई थी कि फंड जारी होने के समय पाकिस्तान न केवल आर्थिक संकट से जूझ रहा था, बल्कि सीमा पार हमलों में भी सक्रिय था, जिससे उसकी सैन्य गतिविधियों को आर्थिक सहारा मिला।

वस्‍तुत: भारतीय आर्थिक विश्लेषकों ने भी इस विफलता को लेकर गंभीर टिप्पणियां की हैं। वरिष्ठ अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला का कहना है कि बेलआउट को सख्त निगरानी और ठोस सुधारों की शर्तों से जोड़ा जाना चाहिए, वरना यह केवल तात्कालिक राहत तक सीमित रह जाएगा। प्रिंसटन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अशोका मोदी का तर्क है कि पाकिस्तान में सैन्य-राजनीतिक गठजोड़ सुधारों की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है, और जब तक सेना का आर्थिक और राजनीतिक हस्तक्षेप खत्म नहीं होगा, तब तक कोई भी वित्तीय पैकेज वास्तविक परिवर्तन नहीं ला सकेगा। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर स्टेफ़न डेरकॉन ने पाकिस्तान को “सीरियल बेलआउट क्लाइंट” बताते हुए कहा कि इसके पीछे राजनीतिक अस्थिरता और संरचनात्मक कमजोरी है।

पाकिस्तान की विफलताएं सिर्फ आर्थिक नहीं, नीतिगत, संस्थागत और संरचनात्मक हैं। आईएमएफ का 7 बिलियन डॉलर का पैकेज एक बार फिर तय करता है कि केवल फंड देना पर्याप्त नहीं; उस पर कार्रवाई, निगरानी और जवाबदेही भी होनी चाहिए। भारत की आपत्तियां (आईएमएफ के बोर्ड में अभाव, कृषि एवं रक्षा खर्च की प्राथमिकता, सेना का प्रभुत्व), भारतीय व अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की टिप्पणियाँ और पाकिस्तान की वास्तविकता, ये सभी मिलकर एक संदेश देते हैं कि बेलआउट का असल स्थायित्व तभी सुनिश्चित होता है, जब सुधार नीति, राजनीतिक जवाबदेही और कैपिटिल इंटर्नल ज़रूरतों को साथ ले कर चलना हो।

भारत का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं को केवल आर्थिक आंकड़ों और तात्कालिक स्थिरता के आधार पर निर्णय नहीं लेना चाहिए। सुरक्षा, राजनीतिक स्थिरता, और सहायता का वास्तविक उपयोग जैसे पहलुओं को भी महत्व देना चाहिए। पाकिस्तान का मामला यह स्पष्ट करता है कि बिना जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित किए दिया गया बेलआउट केवल संकट को आगे खिसकाता है, समाप्त नहीं करता। यही कारण है कि भारत ने न केवल आईएमएफ बल्कि विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक जैसे अन्य संस्थानों को भी बार-बार चेताया है कि पाकिस्तान को दी जाने वाली किसी भी मदद को कड़े सुधारों और निगरानी के साथ जोड़ा जाए।

कुल मिलाकर आज यह कहना सही होगा कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) द्वारा पाकिस्तान को दी गई 7 अरब डॉलर की बेलआउट सुविधा की दूसरी समीक्षा में तीन में से तीन प्रमुख आर्थिक लक्ष्यों में विफलता, संघीय राजस्व बोर्ड (एफबीआर) द्वारा 12.3 लाख करोड़ रुपये संग्रह लक्ष्य का अधूरा रह जाना, ‘ताजिर दोस्त योजना’ के तहत 50 अरब रुपये जुटाने में विफलता और प्रांतीय सरकारों द्वारा 1.2 लाख करोड़ रुपये की बचत लक्ष्य का अधूरा रह जाना ने सिर्फ आर्थिक ही नहीं, बल्कि राजनीतिक मसलों को भी फिर से गर्म कर दिया है। इन लक्ष्यों की पूर्ति न हो पाने से पाकिस्तान की वित्तीय प्रबंधन क्षमता पर सवाल उठे हैं और भारत की वह पुरानी आपत्ति कि पाकिस्तान ‘आईएमएफ फंड’ का उपयोग सैन्य और आतंकवादी गतिविधियों में कर सकता है भी आज पुष्ट होती दिख रही है।


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