पूजा सिंघल की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की, मनी लॉन्ड्रिंग मामले की सुनवाई जारी

NEWS SAGA DESK

मनी लॉन्ड्रिंग मामले में फंसी IAS अधिकारी पूजा सिंघल को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली है। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए ट्रायल जारी रखने का आदेश दिया। पढ़ें पूरी खबर।

झारखंड कैडर की वरिष्ठ आईएएस अधिकारी पूजा सिंघल को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में सर्वोच्च न्यायालय से एक और बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने उनके खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) की विशेष अदालत द्वारा लिए गए संज्ञान (Cognizance) के आदेश को रद्द करने से साफ इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद अब ED की विशेष अदालत में उनके खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ी न्यायिक कार्यवाही और ट्रायल पूर्ववत जारी रहेगा।

आईएएस अधिकारी पूजा सिंघल

सुप्रीम कोर्ट में क्या था पूरा मामला?

पूजा सिंघल ने झारखंड उच्च न्यायालय के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उनकी याचिका को खारिज कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में पूजा सिंघल के वकील ने मुख्य रूप से यह मुद्दा उठाया था कि उनके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए आवश्यक कानूनी प्रक्रिया यानी ‘अभियोजन स्वीकृति’ (Prosecution Sanction) नहीं ली गई थी।

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने कोर्ट में दलील दी कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 197 के तहत किसी भी वर्तमान या पूर्व लोक सेवक (Public Servant) के खिलाफ सरकारी कर्तव्यों के निर्वहन से जुड़े मामलों में मुकदमा चलाने के लिए संबंधित सरकार से पूर्व मंजूरी लेना अनिवार्य है। उनकी ओर से तर्क दिया गया कि चूंकि इस मामले में सक्षम प्राधिकारी से कोई वैध अभियोजन स्वीकृति प्राप्त नहीं की गई थी, इसलिए ED की विशेष अदालत द्वारा मामले का संज्ञान लेना कानूनी रूप से गलत था और इसे रद्द किया जाना चाहिए।

ED का पक्ष और अदालत की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ओर से उपस्थित अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस.वी. राजू ने याचिका का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने अदालत को सूचित किया कि ED की विशेष अदालत ने वर्ष 2022 में ही इस मामले में अपराध का संज्ञान ले लिया था। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मामले में न्यायिक कार्यवाही काफी समय पहले शुरू हो चुकी है और इस चरण में संज्ञान आदेश को रद्द करने का कोई औचित्य नहीं बनता है।

ED की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि अभियोजन स्वीकृति के बिंदु पर नए कानून यानी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के प्रावधानों के तहत भी विचार किया गया है, जिसमें कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में अभियोजन स्वीकृति को ‘डीम्ड’ यानी स्वतः स्वीकृत माना जा सकता है।

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने ED कोर्ट के संज्ञान लेने के फैसले को पूरी तरह सही माना और याचिका को खारिज कर दिया। अदालत के इस रुख से यह साफ हो गया है कि तकनीकी या प्रक्रियात्मक आधारों पर मामले की सुनवाई को रोका नहीं जा सकता।

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