छत्‍तीसगढ़ में नक्सल पर कसता शिकंजा : आने लगे सार्थक परिणाम

News Saga Desk

छत्तीसगढ़ की धरती लंबे समय से लाल आतंक की त्रासदी झेलती रही है। कभी दंतेवाड़ा से लेकर बस्तर और नारायणपुर तक नक्सलियों का बोलबाला था, जंगलों में बंदूक की आवाज़ें गूंजती थीं और जनजाति समाज भय और असुरक्षा के साए में जीने को मजबूर थी, परंतु अब पिछले कुछ वर्षों में इस तस्वीर में निर्णायक बदलाव आया है। राज्य सरकार और केंद्र सरकार की समन्वित रणनीति, सुरक्षा बलों की लगातार दबिश और विकास व पुनर्वास की समानांतर नीतियों ने वह काम किया है जो वर्षों तक एक असंभव प्रतीत होता था। देखने में आ रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राज्‍य की भाजपा सरकार के नेतृत्व और नक्सल मुक्त भारत के उनके दृष्टिकोण के तहत, ऐसी कई पहलें देश के उन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के जीवन में बदलाव ला रही हैं, जो कभी देश के ‘वर्जित क्षेत्र’ रहे हैं।

नारायणपुर की घटना ताज़ा उदाहरण है, जहां दो महिलाओं समेत आठ नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। इन पर कुल तीस लाख रुपये का इनाम घोषित था। इनमें से कई कुख्यात माओवादी नेता थे। सुखलाल एक डिवीजनल कमेटी सदस्य और “माओवादी डॉक्टर” के रूप में सक्रिय था, उस पर आठ लाख का इनाम था। इसी तरह हुर्रा भी कंपनी नंबर 1 पीपीसीएम से जुड़ा था और उसके सिर पर भी आठ लाख का इनाम था। पोडियाम एरिया कमेटी मेंबर और लोकल ऑर्गनाइजेशन स्क्वॉड का डिप्टी कमांडर था। कमला और दीपा जैसी महिला सदस्य भी संगठन में अहम जिम्मेदारी संभाल रही थीं। इन आत्मसमर्पणों से यह स्पष्ट होता है कि जंगलों के भीतर भी माओवादियों का मनोबल लगातार टूट रहा है।

“ऑपरेशन प्रहार” और “ऑपरेशन डॉन” जैसी मुहिम का दिख रहा बड़ा असर

वस्‍तुत: यह सिलसिला केवल नारायणपुर तक सीमित नहीं है। बीते वर्षों में बस्तर, सुकमा, कांकेर, दंतेवाड़ा और बीजापुर जैसे इलाकों में सुरक्षा बलों ने कई बड़े ऑपरेशन चलाए। छत्तीसगढ़ पुलिस और केंद्रीय बलों ने मिलकर “ऑपरेशन प्रहार” और “ऑपरेशन डॉन” जैसी मुहिमें चलाईं, जिनमें एक के बाद एक बड़े नक्सली ढेर हुए। कुख्यात माओवादी नेता हिड़मा, जो बस्तर डिवीजन कमेटी का सबसे खतरनाक चेहरा माना जाता था, लंबे समय तक सुरक्षा एजेंसियों के निशाने पर रहा। उसके नेटवर्क को जिस तरह से तोड़ा गया, वह राज्य की सुरक्षा रणनीति की सफलता का उदाहरण है। इसके अलावा मांडवी हिड़मा, गुडसा उसेंडी और अन्य कई कुख्यात कमांडरों के मारे जाने या आत्मसमर्पण से संगठन की रीढ़ टूट चुकी है।

नक्सलवाद केवल बंदूक की लड़ाई नहीं है, यह विचारधारा की लड़ाई भी है। माओवादी संगठन लंबे समय तक आदिवासियों के नाम पर उन्हें बरगलाता रहा, उनके विकास और हक की बातें कर उन्हें सरकार और व्यवस्था से दूर रखता रहा। परंतु जब केंद्र और राज्य सरकार ने यह ठाना कि विकास को ही हथियार बनाया जाएगा, तब तस्वीर बदलने लगी। सड़कें बनीं, पुल बने, स्कूल और अस्पताल खुले, मोबाइल टावर खड़े हुए और आदिवासी इलाकों में पहली बार शासन-प्रशासन की मौजूदगी महसूस हुई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कई बार यह कह चुके हैं कि “नक्सलवाद बंदूक की गोलियों से नहीं, विकास की रोशनी से खत्म होगा।” यही सोच छत्तीसगढ़ की रणनीति की रीढ़ बनी हुई दिखाई देने लगी है।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भी हाल ही में कहा कि “हमारी प्राथमिकता केवल कानून-व्यवस्था नहीं है, बल्कि आदिवासी समाज को मुख्यधारा से जोड़ना और उन्हें भयमुक्त वातावरण देना है। पुनर्वास नीति इसी सोच का हिस्सा है।” यह वही नीति है जिसने नारायणपुर के आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को हथियार छोड़ने के लिए प्रेरित किया। राज्य सरकार ने उन्हें पचास-पचास हजार रुपये की तत्काल सहायता दी है और आगे शिक्षा, रोजगार और सामाजिक पुनर्वास की गारंटी भी दी है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी कई बार यह दोहराया है कि 2026 तक देश को नक्सलवाद से मुक्त करना सरकार का लक्ष्य है। उनके शब्दों में, “नक्सलवाद इस देश के विकास और लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी बाधा रहा है। हमने पिछले दस वर्षों में इसे जड़ से खत्म करने की दिशा में ऐतिहासिक प्रगति की है और अब यह आतंक अपने अंतिम चरण में है।” वास्तव में आंकड़े इस दावे की पुष्टि करते हैं।

बीते एक दशक में नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या आधी रह गई है। जहां कभी छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और बिहार समेत 126 से अधिक जिले इस लाल आतंक से प्रभावित थे, आज इनकी संख्या सिमटकर 18 से भी कम रह गई है। जिसमें कि छह जिले सबसे अधिक प्रभावित हैं, छत्तीसगढ़ के बीजापुर, कांकेर, नारायणपुर और सुकमा, झारखंड का पश्चिमी सिंहभूम और महाराष्ट्र का गढ़चिरौली। वहीं, छह जिले ‘चिंताजनक श्रेणी’ में हैं, आंध्र प्रदेश (अल्लूरी सीताराम राजू), मध्यप्रदेश (बालाघाट), ओडिशा (कालाहांडी, कंधमाल, मलकानगिरी), तेलंगाना (भद्राद्री-कोठागुड़ेम)। इसी तरह से अब अन्य प्रभावित जिले में छत्तीसगढ़ (दंतेवाड़ा, गरियाबंद, मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी), झारखंड (लातेहार), ओडिशा (नुआपाड़ा), तेलंगाना (मुलुगु) शामिल हैं।

नक्सल हिंसा में भारी गिरावट

नक्‍सलवाद के खात्‍में के लिए बनाई गई नीति के सख्त और सुनियोजित क्रियान्वयन से देश भर में 2010 की तुलना में नक्सली हिंसा में 81% की कमी आ चुकी है, जबकि सुरक्षाबलों और आम नागरिकों की मौतों में 85% की गिरावट दर्ज की गई है। छत्तीसगढ़ में भी यही तस्वीर है। नारायणपुर जिले में इस साल अब तक 148 नक्सली आत्मसमर्पण कर चुके हैं। बीजापुर और सुकमा में भी सौ से अधिक नक्सली या तो मारे गए हैं या सरेंडर कर चुके हैं। इनमें कई मोस्ट वांटेड नाम भी शामिल हैं। 2023 में दंतेवाड़ा के अरनपुर में हुए एनकाउंटर में बस्तर डिवीजन के बड़े कमांडरों का खात्मा हुआ। कांकेर जिले में भी हाल ही में सुरक्षाबलों ने कई माओवादी नेताओं को ढेर किया। इन सबका नतीजा यह है कि माओवादी संगठन के पास अब वैसा ढांचा और नेतृत्व नहीं बचा है जैसा कभी था।

सरकार कर रही दोहरी रणनीति पर काम

नक्सलवाद को खत्म करने में सरकार ने दोहरी रणनीति अपनाई हुई है- एक ओर सुरक्षा बलों को अत्याधुनिक हथियार, ड्रोन, ट्रैकिंग तकनीक और बेहतर इंटेलिजेंस से लैस किया गया है तो दूसरी ओर आदिवासी समाज को विकास की मुख्यधारा से जोड़ा गया। यह संतुलन ही सफलता की कुंजी बना। पहले केवल सैन्य दबाव से नक्सलवाद को खत्म करने की कोशिश की जाती थी, लेकिन वह असफल रही क्योंकि जंगलों में छिपे नक्सली बार-बार लौट आते थे। पर जब विकास का विकल्प सामने आया, तब आदिवासी समाज ने नक्सलियों से दूरी बनानी शुरू की। आज स्थिति यह है कि खुद गांव के लोग पुलिस और प्रशासन को सूचना देने लगे हैं, जिससे माओवादियों की जड़ें और कमजोर हो रही हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में एक रैली में कहा था, “छत्तीसगढ़ की धरती अब रक्तरंजित नहीं, विकास की धरती बन रही है। हमारे जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा और इस दशक के अंत तक देश नक्सलवाद की चुनौती से मुक्त होगा।” यह बयान केवल राजनीति नहीं, बल्कि उस हकीकत का आईना है जिसे आंकड़े और घटनाएं बार-बार साबित कर रही हैं। फिर भी यह लड़ाई पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। नक्सली संगठन भले कमजोर हो गए हों, लेकिन उनकी जड़ें पूरी तरह सूखी नहीं हैं। जंगलों में अभी भी कुछ बिखरे हुए गुट सक्रिय हैं, जो बीच-बीच में सुरक्षा बलों पर हमले की कोशिश करते रहते हैं। हाल ही में दंतेवाड़ा और सुकमा में आईईडी ब्लास्ट हुए थे। इन घटनाओं से साफ है कि आत्मसंतोष की कोई जगह नहीं है। सरकार और सुरक्षा बलों को अपनी मुहिम लगातार जारी रखनी होगी।

बन सकता है छत्तीसगढ़ का अनुभव देश के लिए मॉडल

विश्लेषण यही बताता है कि नक्सलवाद के खिलाफ छत्तीसगढ़ का अनुभव देश के लिए एक मॉडल बन सकता है। 78 वर्षों में पहली बार, भारत के 79वें स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर क्षेत्र के 29 गाँवों में गर्व से तिरंगा फहराया गया। यह ऐतिहासिक आयोजन दशकों के वामपंथी उग्रवादियों के नियंत्रण के बाद हुआ है, जहाँ ग्रामीणों को लंबे समय तक ऐसे त्योहार मनाने का अधिकार नहीं था। इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस समारोह में ग्रामीणों ने नारायणपुर जिले में होराडी, गारपा, कछपाल, कोडलियार, कुतुल, बड़ेमाकोटि, पद्मकोट, कंदुलनार, नेलांगुर, पांगुर और रायनार में ध्वजारोहण हुआ। सुकमा में, रायगुडेम, तुमालपाड, गोलाकुंडा, गोमगुडा, मेट्टागुडा, उस्कावया और मुलकाथोंग जैसे गांवों से पहली बार तिरंगा फहराया। इस बीच, बीजापुर जिले में, कोंडापल्ली, जीदापल्ली, वटेबागु, कर्रेगुट्टा, पिडिया, गुंजेपार्टी, पुजारी, कांकेर, भीमाराम, कोरचोली और कोटपल्ली जश्न में उन्‍होंने बड़ी संख्‍या में भाग लिया।

आज यहां निरंतर उग्रवाद-रोधी उपाय और विकास योजनाएँ इस क्षेत्र की तस्वीर बदल रही हैं। आंतरिक इलाकों में पुलिस कैंप स्थापित किए गए हैं, जो स्थानीय समुदायों को सुरक्षा और आत्मविश्वास प्रदान कर रहे हैं। जिला रिजर्व गार्ड, बस्तर फाइटर्स, स्पेशल टास्क फोर्स और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल जैसे विशेष बल लगातार गश्त कर रहे हैं, जिससे ग्रामीणों को जश्न मनाने का अपना अधिकार वापस पाने में मदद मिल रही है। यही कारण है कि जहां पहले नक्सल प्रभावित इलाकों से पलायन होता था, वहीं आज लोग गांव लौट रहे हैं, खेती-किसानी कर रहे हैं और बच्चों को स्कूल भेज रहे हैं। यही असली जीत है।

अगर आने वाले वर्षों में भी यही संतुलन कायम रखा गया, तो वह दिन दूर नहीं जब नक्सलवाद केवल इतिहास की किताबों में दर्ज होगा। तब छत्तीसगढ़ की धरती विकास और शांति की मिसाल बनेगी और यह कहा जाएगा कि दुनिया के सबसे कठिन आंतरिक संघर्षों में से एक को भारत में लोकतंत्र और विकास की ताकत के जरिए हरा दिया गया है ।


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