भारत-जापान संबंध : निवेश से रणनीति तक नई ऊँचाइयाँ

News Saga Desk

भारत और जापान के बीच संबंध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से गहरे और सार्थक रहे हैं। बौद्ध धर्म से शुरू हुआ यह रिश्ता आज इक्कीसवीं सदी में व्यापक आर्थिक, रणनीतिक और तकनीकी साझेदारी का एक व्‍यापक एवं भरोसेमंद रूप ले चुका है। अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जापान यात्रा ने एक बार फिर इस मित्रता को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण बना दिया है। यह यात्रा ऐसे समय पर हो रही है जब अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में गहरी हलचलें हैं, खास कर चीन के बाजार की आक्रामकता, अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध के बीच वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के पुनर्गठन के दौर का चलन जिस समय में सबसे अधिक दिखता हो । ऐसे में भारत-जापान संबंध न केवल द्विपक्षीय दृष्टि से, बल्कि वैश्विक संतुलन के लिए भी निर्णायक साबित हो सकते हैं।

भारत और जापान के रिश्तों की नींव में स्वतंत्रता के बाद 1952 में परस्‍पर दोनों देशों ने कूटनीतिक संबंध स्थापित किए हैं। भारत उन चंद देशों में शामिल था जिसने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जापान पर थोपे गए सैन फ्रांसिस्को संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए। यह जापान के प्रति भारत की सकारात्मक सोच का प्रमाण था। इसके बाद से यदि हम देखें तो भरोसे की नींव का प्रभाव भारत के हित में कुछ इस प्रकार रहा है कि जापान पिछले दो दशकों में भारत में निवेश का बड़ा स्रोत बनकर उभरा है। अप्रैल 2000 से मार्च 2024 तक भारत में जापान का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश लगभग 40 अरब डॉलर से अधिक रहा है। यह भारत के लिए चौथा सबसे बड़ा एफडीआई स्रोत है। जापान ने अगले दस सालों में भारत में करीब ¥10 ट्रिलियन (5,800 लाख करोड़ रुपए) निवेश करने का ऐलान किया है। यह 2022 में किए गए पाँच साल के लिए ¥5 ट्रिलियन (2,750 लाख करोड़ रुपए) निवेश की प्रतिबद्धता से कहीं ज्यादा है।

जापानी निवेश ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऊर्जा, मशीनरी, स्मार्ट सिटी, मेट्रो रेल, हाई स्पीड रेल और बंदरगाह विकास जैसे क्षेत्रों में केंद्रित है। टोयोटा, होंडा, सुजुकी, हिताची, पैनासोनिक और मित्सुबिशी जैसी कंपनियाँ भारत में लंबे समय से सक्रिय हैं। मारुति-सुजुकी का उदाहरण भारत-जापान औद्योगिक सहयोग की सफलता का एक ऐसा प्रतीक है जो व‍िश्‍व के कई देशों के लिए एक आदर्श मिसाल है। साथ ही एक बाजार के तौर पर यह साफ दिखाई देता है कि जापान को बड़े पैमाने वाले बाजार की जरूरत है और भारत यह अवसर देता है। अमेरिकी टैरिफ से मुनाफा घट रहा है, इसलिए जापानी कंपनियों को अब ऐसे बाजार की तलाश है जहाँ कीमतें कम हों और खपत ज्यादा।

भारत इस मामले में सबसे उपयुक्त है यहाँ 1.4 अरब की जनसंख्‍या है, तेजी से बढ़ता हुआ मध्यम वर्ग है और 6.4% जीडीपी वृद्धि का अनुमान है। यही वजह है कि भारत आज भी जापान के लिए सबसे व्यवहारिक निवेश और व्‍यापार का अवसर बना हुआ है।

जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (जीका) भारत की अनेक परियोजनाओं में सहायक रही है, दिल्ली मेट्रो, मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन, दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा आदि में इसके काम को देखा जा सकता है, जो दोनों ही देशों के परस्‍पर के विश्‍वास को दृढ़ करने का आधार है। यह स्पष्ट है कि जापान, भारत की आर्थिक प्रगति में एक भरोसेमंद और दीर्घकालिक सहयोगी है। अत: इन सभी आधारों के प्रकाश में कहना होगा कि भारत और जापान एक-दूसरे के लिए अपरिहार्य हैं। भारत के लिए जापान उच्च तकनीक, पूँजी, हरित ऊर्जा समाधान और स्थायी निवेश का स्रोत है। जापान के लिए भारत सबसे बड़ा लोकतंत्र, दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला वह देश हे, जिसकी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और जो अपने आप में एक विशाल उपभोक्ता बाजार है। दोनों देशों की यह परस्पर निर्भरता इन्हें स्वाभाविक साझेदार बनाती है।

इन दोनों ही देशों के बीच यदि हम सम्‍बन्‍धों के आधार पर तुलनात्‍मक अध्‍ययन करें तो ध्‍यान में आता है कि मोदी सरकार के दौर में भारत-जापान संबंध नई ऊँचाइयों तक पहुँचे हैं। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी की पहली द्विपक्षीय यात्रा यदि किसी देश में की तो वह जापान ही है। इस दौरान संबंध “विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी” तक उन्नत हुए। अहमदाबाद-मुंबई हाई-स्पीड रेल परियोजना में जापान का योगदान मोदी सरकार की बड़ी उपलब्धि है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा के लिए भारत, जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया का क्वाड मंच सक्रिय हुआ। जापान ने भारतीय स्टार्टअप्स और डिजिटल नवाचारों में भी निवेश बढ़ाया। यह सब दर्शाता है कि मोदी सरकार में दोनों देशों के रिश्तों ने ठोस और दीर्घकालिक दिशा पाई है।

आज हिंद-प्रशांत क्षेत्र वैश्विक राजनीति का केंद्र है। भारत और जापान दोनों स्वतंत्र और सुरक्षित समुद्री मार्गों के पक्षधर हैं। मालाबार अभ्यास जैसे अभियानों में जापान की भागीदारी इस साझेदारी को मजबूत करती है। साइबर सुरक्षा और आतंकवाद-विरोधी सहयोग के क्षेत्र में भी समझौते हुए हैं। चीन की विस्तारवादी नीतियों के बीच यह सहयोग पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र के लिए स्थिरता का आधार बन सकता है। जापान तकनीकी नवाचार और स्वच्छ ऊर्जा में अग्रणी है। इलेक्ट्रिक वाहन, हाइड्रोजन ऊर्जा, स्मार्ट ग्रिड और नवीकरणीय ऊर्जा में जापान की विशेषज्ञता भारत के लिए उपयोगी है। यह सहयोग भारत की “नेट-जीरो” प्रतिबद्धता और जलवायु परिवर्तन से निपटने की रणनीति को मजबूती देगा। भारत में ग्रीन हाइड्रोजन मिशन और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी में जापान की भूमिका निर्णायक हो सकती है। हालाँकि भारत-जापान संबंध मजबूत हैं, लेकिन चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इस जापान यात्रा से हमें उम्‍मीद करना चाहिए कि इस दिशा में पहले से कई गुना बेहतर कार्य होगा और जो रुकावटें हैं, वे समाप्‍त होंगी। क्‍योंकि निवेश परियोजनाओं की धीमी प्रगति और नौकरशाही अड़चनें, व्यापार असंतुलन, क्योंकि भारत का आयात जापान से सबसे अधिक आज दिखाई देती हैं, जिनको लेकर दोनों देशों के बीच विश्‍वास बहाली के लिए अभी बहुत काम होना बाकी है। एक तरह से देखें तो भारत का मानव संसाधन और व्‍यापक बाजार तथा जापान की तकनीकी दक्षता और पूँजी, दोनों देशों को भविष्य में विभिन्‍न प्रकार से एक दूसरे के लिए सहयोग का अवसर प्रदान करते हैं।

हमें समझना होगा कि वर्तमान दौर में प्रधानमंत्री मोदी की जापान यात्रा केवल कूटनीतिक घटना नहीं है, भले ही फिर ऐसा दिखाई देता हो, क्‍योंकि इस यात्रा का जो समय है, वह उस वक्‍त में निर्धारित हुआ है, जब अमेरिका ने भारत को आर्थक रूप से कमजोर करने के लिए उस पर भारी भरकम टैरिफ लगा दिया है। प्रधानमंत्री मोदी का जापान जाना वस्‍तुत: आज यह दर्शा रहा है कि भारत अपने इस साझेदार को रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से उच्च प्राथमिकता देता है। पिछले वर्षों में भारत और जापान के संबंधों का दायरा केवल व्यापार और निवेश तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें सुरक्षा, तकनीकी नवाचार, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, बुनियादी ढाँचे और सांस्कृतिक सहयोग शामिल हैं। इसलिए आज फिर एक बार भारत-जापान मित्रता का नया अध्याय लिखा जा रहा है।

दोनों देशों के बीच निवेश, तकनीक, हरित ऊर्जा, सुरक्षा और सांस्कृतिक सहयोग के बहुआयामी आयाम इस रिश्ते को आने वाले दशकों तक और मजबूत करेंगे। फिर भारत और जापान न केवल द्विपक्षीय दृष्टि से बल्कि पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र की स्थिरता और विकास के लिए भी एक-दूसरे के अपरिहार्य साझेदार हैं। यह यात्रा इस तथ्य को पुष्ट करती है कि भारत और जापान की साझेदारी भविष्य की वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में निर्णायक भूमिका निभाने जा रही है।

इसके साथ ही एक जो सबसे बड़ा दोनों देशों के बीच साझा विरासत दिखाई देती है, वह भारत और जापान के बीच सांस्कृतिक रिश्तों को लेकर है, जोकि प्राचीन समय से ही बहुत गहरे रहे हैं। बौद्ध धर्म ने दोनों देशों को आध्यात्मिक रूप से जोड़ा है। यही कारण है कि इस दिशा में लगातार शिक्षा और शोध में सहयोग से नई पीढ़ी के बीच अनेक अवसर बढ़ते हुए देखे गए। उम्‍मीद करें कि इस बार की ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जापान यात्रा भी एक सफल और देश हित में बहुत परिणामकारी सिद्ध होगी ।


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