दहकते अंगारों पर चलकर भोलेनाथ को किया प्रसन्न, पिठौरिया में श्रद्धा और लोक संस्कृति का अद्भुत संगम

News Saga Desk

रांची के पिठौरिया में आयोजित ऐतिहासिक महादेव मंडा पूजा में आस्था, तपस्या और लोक संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिला। भगवान भोलेनाथ को समर्पित इस नौ दिवसीय अनुष्ठान में श्रद्धालुओं ने कठिन व्रत और धार्मिक नियमों का पालन करते हुए अपनी अटूट श्रद्धा का परिचय दिया। पूरे क्षेत्र में ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष के बीच भक्ति का माहौल बना रहा।

मंडा पूजा के दौरान बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों सहित सैकड़ों श्रद्धालुओं ने दहकते अंगारों पर नंगे पैर चलकर भगवान शिव के प्रति अपनी अटूट आस्था व्यक्त की। इस अलौकिक दृश्य को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु और दर्शक पिठौरिया पहुंचे। अंगारों पर चलने की इस परंपरा को मंडा पूजा का सबसे महत्वपूर्ण और आकर्षक हिस्सा माना जाता है।

इस वर्ष पूजा में 251 भोक्ता और 301 सोक्ता शामिल हुए। सभी ने कठिन व्रत और धार्मिक अनुष्ठानों का पालन करते हुए भगवान भोलेनाथ की आराधना की। रात के समय पश्चिम बंगाल के पुरुलिया से आए कलाकारों ने पारंपरिक छऊ नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति देकर श्रद्धालुओं का मन मोह लिया।

अगले दिन आयोजित झूलन कार्यक्रम में पारंपरिक महिला वेशभूषा में सजे भोक्ता ऊंचे लठ के सहारे हवा में झूलते नजर आए। इस दौरान उन्होंने श्रद्धालुओं पर फूलों की वर्षा की। मान्यता है कि इन फूलों को प्राप्त करने से घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है। यही वजह रही कि फूलों को पाने के लिए श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिला।

मंडा पूजा की यह परंपरा नागवंशी राजाओं के शासनकाल से जुड़ी मानी जाती है। इतिहासकारों और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार नागवंशी शासक भगवान शिव के परम उपासक थे और उन्होंने इस पूजा परंपरा को संरक्षण दिया। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक यह अनुष्ठान माता सती के आत्मबलिदान की स्मृति में भी किया जाता है, जिसमें श्रद्धालु कठिन तप और आत्मसंयम के माध्यम से अपनी भक्ति प्रकट करते हैं।

झारखंड की लोक संस्कृति में मंडा पूजा आदिवासी और सदानी परंपराओं के समन्वय का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज, सामूहिक उपवास, लोकनृत्य और धार्मिक अनुष्ठान समाज में एकता, भाईचारे और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का संदेश देते हैं।

मंडा पूजा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि त्याग, तपस्या, अनुशासन और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। बदलते समय में भी यह परंपरा नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने और झारखंड की समृद्ध विरासत को सहेजने का कार्य कर रही है।

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