NEWS SAGA DESK
रांची: झारखंड में 2027 की जनगणना में आदिवासियों के लिए अलग सरना धर्म कोड की मांग के बाद अब पिछड़े वर्ग (ओबीसी) समुदाय ने भी अपनी अलग पहचान की मांग तेज कर दी है। राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग का घेराव कर प्रदर्शनकारियों ने केंद्र सरकार पर ओबीसी आबादी के अधिकारों की अनदेखी का आरोप लगाया।
राष्ट्रीय ओबीसी मोर्चा के आह्वान पर बुधवार को सैकड़ों प्रदर्शनकारी ओल्ड विधानसभा से राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग कार्यालय तक आक्रोश मार्च निकालकर पहुंचे। मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने अलग “ओबीसी कोड” की मांग को लेकर नारेबाजी की और आयोग के अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा।
राष्ट्रीय ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष राजेश गुप्ता ने कहा कि केंद्र सरकार देश की 52 प्रतिशत ओबीसी आबादी को “अन्य” श्रेणी में रखकर उनके अधिकारों की अनदेखी कर रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (एससी-एसटी) की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति से जुड़ी जानकारी जुटाई जा रही है, तो ओबीसी समाज का अलग आंकड़ा क्यों नहीं लिया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि जनगणना के पहले चरण में मकान, कमरों की संख्या और अन्य सामाजिक-आर्थिक जानकारियां एससी-एसटी समुदाय के लिए दर्ज की जा रही हैं, लेकिन ओबीसी के लिए ऐसी व्यवस्था नहीं है। राजेश गुप्ता ने चेतावनी दी कि यदि जनगणना में ओबीसी का वास्तविक डेटा नहीं जुटाया गया तो उनके लिए योजनाएं बनाने और अधिकार सुनिश्चित करने में कठिनाई होगी। उन्होंने इसे पिछड़े समाज की समस्याओं को छिपाने की कोशिश बताया।
प्रदेश ओबीसी महिला मोर्चा की अध्यक्ष उर्मिला यादव ने भी केंद्र सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम में भी ओबीसी समुदाय की उपेक्षा की गई है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से ओबीसी की गणना को लेकर स्पष्ट रुख सामने रखने की मांग की।
उर्मिला यादव ने कहा कि पिछड़े वर्ग से आने वाले प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली सरकार में ही ओबीसी समाज के साथ अन्याय किया जा रहा है। इसी के विरोध में समुदाय के लोग सड़क पर उतरने को मजबूर हुए हैं।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि एससी-एसटी की तर्ज पर ओबीसी के लिए भी अलग कोड बनाए जाने से उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति का सही आकलन हो सकेगा। इससे लक्षित योजनाओं का लाभ जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाने में मदद मिलेगी। उनका तर्क है कि वर्तमान व्यवस्था में ओबीसी को सामान्य श्रेणी में रखकर डेटा एकत्र किए जाने से उनकी वास्तविक आबादी और सामाजिक स्थिति का स्पष्ट आकलन नहीं हो पाता।
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