जर्मनी के डॉक्टर को भाया भागलपुर का इलाज, सीखने पहुंचे यहां

NEWS SAGA DESK

जर्मनी के डॉ. जॉन वुल्फ भागलपुर में सीमित संसाधनों में जटिल ऑर्थोपेडिक इलाज की तकनीक सीख रहे हैं। YouTube वीडियो देखकर यहां आने की प्रेरणा मिली।

भागलपुर: जर्मनी के एक युवा चिकित्सक को भागलपुर की चिकित्सा प्रणाली इतनी पसंद आई कि वह यहां की कार्यप्रणाली को करीब से समझने के लिए खुद भागलपुर पहुंच गए। जर्मनी के एलएमयू यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल-म्यूनिख के मस्कुलोस्केलेटल यूनिवर्सिटी सेंटर में ट्रॉमा सर्जरी और ऑर्थोपेडिक्स विभाग के रेजिडेंट फिजिशियन डॉ. जॉन वुल्फ इन दिनों तातारपुर स्थित ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. इम्तियाजुर रहमान के नर्सिंग होम में क्लिनिकल ऑब्जरवेशन कर रहे हैं।

भागलपुर की चिकित्सा प्रणाली

डॉ. जॉन का मुख्य उद्देश्य सीमित संसाधनों में जटिल ऑर्थोपेडिक और ट्रॉमा मामलों के इलाज की प्रक्रिया, सर्जिकल निर्णय लेने की तकनीक और ऑपरेशन के बाद मरीजों की देखभाल को करीब से समझना है। जर्मनी जैसे विकसित चिकित्सा तंत्र से आने वाले डॉक्टर का भागलपुर में आकर सीखना चिकित्सा क्षेत्र में ज्ञान के अंतरराष्ट्रीय आदान-प्रदान का अनोखा उदाहरण माना जा रहा है।

दो साल से YouTube पर देख रहे थे ऑपरेशन

डॉ. जॉन वुल्फ ने बताया कि वह करीब दो वर्षों से YouTube पर डॉ. इम्तियाजुर रहमान के मरीजों के सफल ऑपरेशन से जुड़े वीडियो देखते आ रहे हैं। खासकर ऐसे जटिल मामलों का उपचार, जिनमें सीमित संसाधनों के बावजूद मरीजों को बेहतर परिणाम मिले, उनकी दिलचस्पी का कारण बना।

वीडियो के माध्यम से ऑपरेशन की तकनीक और मरीजों के इलाज की प्रक्रिया देखने के बाद उनके मन में यह जानने की जिज्ञासा बढ़ी कि वास्तविक परिस्थितियों में डॉक्टर मरीज का मूल्यांकन कैसे करते हैं और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार उपचार की रणनीति किस तरह तय करते हैं।

इसी जिज्ञासा ने उन्हें जर्मनी से भागलपुर आने के लिए प्रेरित किया।

16 अगस्त से शुरू हुआ 15 दिन का ऑब्जरवेशन

डॉ. जॉन वुल्फ 16 अगस्त को 15 दिनों के क्लिनिकल ऑब्जरवेशन प्रोग्राम के लिए भागलपुर पहुंचे। वह तातारपुर स्थित डॉ. इम्तियाजुर रहमान के एडवांस ट्रॉमा एंड माइक्रोसर्जिकल सेंटर में रहकर यहां की चिकित्सा व्यवस्था का अध्ययन कर रहे हैं।

इस दौरान वह मरीजों के शुरुआती मूल्यांकन से लेकर बीमारी की गंभीरता के आधार पर उपचार की रणनीति तय करने तक की प्रक्रिया देख रहे हैं। सर्जरी की जरूरत का फैसला किस आधार पर लिया जाता है और ऑपरेशन के बाद मरीजों की निगरानी व देखभाल कैसे की जाती है, यह भी उनके अध्ययन का हिस्सा है।

डॉ. जॉन के मुताबिक, वह विशेष रूप से यह समझना चाहते हैं कि मरीज की बीमारी की गंभीरता और आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए कम खर्च में प्रभावी उपचार की लाइन ऑफ ट्रीटमेंट कैसे तय की जाती है।

जर्मनी से भागलपुर तक ज्ञान का सफर

डॉ. इम्तियाजुर रहमान के अनुसार, जर्मनी जैसे विकसित देश से किसी युवा चिकित्सक का भागलपुर आकर यहां की चिकित्सा और सर्जिकल कार्यप्रणाली का अध्ययन करना महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक है।

उनका कहना है कि ऐसे क्लिनिकल ऑब्जरवेशन कार्यक्रम अलग-अलग देशों की उपचार पद्धतियों को समझने और चिकित्सा क्षेत्र में ज्ञान साझा करने का अवसर देते हैं। इससे मरीजों के लिए किफायती और प्रभावी उपचार के नए तरीकों पर भी विचार किया जा सकता है।

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