राँची के लोक भवन में राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने ICCR के विदेशी विद्यार्थियों और शोधार्थियों के साथ संवाद किया। जानें भारत के शैक्षणिक इतिहास और वसुधैव कुटुम्बकम् पर राज्यपाल के विचार।
राँची स्थित लोक भवन में आज माननीय राज्यपाल श्री संतोष कुमार गंगवार ने भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) के अंतर्गत भारत में उच्च शिक्षा एवं शोध कर रहे विभिन्न देशों के विद्यार्थियों और शोधार्थियों के साथ संवाद किया। इस अवसर पर राज्यपाल ने भारत की प्राचीन शिक्षा परंपरा, वैश्विक सहयोग, और शांति एवं करुणा के मूल्यों पर प्रकाश डाला।

ज्ञान एवं शिक्षा की प्राचीन भूमि है भारत
विदेशी विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए राज्यपाल महोदय ने कहा कि भारत को प्राचीन काल से ही ज्ञान एवं शिक्षा की भूमि के रूप में जाना जाता रहा है। तक्षशिला, नालंदा एवं विक्रमशिला जैसे प्रसिद्ध शिक्षा केंद्रों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इन संस्थानों में विश्व के कोने-कोने से विद्यार्थी ज्ञान प्राप्त करने आते थे। ज्ञान और विचारों के आदान-प्रदान की यह समृद्ध परंपरा आज भी हमें निरंतर प्रेरित करती है।
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और वैश्विक संबंध
राज्यपाल ने श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल, इराक तथा विभिन्न अफ्रीकी एवं मध्य-पूर्व के देशों से आए विद्यार्थियों का स्वागत करते हुए कहा कि उनका भारत में अध्ययन करना दोनों देशों के बीच मजबूत शैक्षणिक और सांस्कृतिक संबंधों का प्रतीक है। भारत “वसुधैव कुटुम्बकम्” के शाश्वत सिद्धांत में विश्वास रखता है। भगवान बुद्ध और भगवान महावीर की इस पावन धरती ने पूरे विश्व को शांति, करुणा, अहिंसा और सद्भाव का संदेश दिया है, जिसकी प्रासंगिकता आज के दौर में और अधिक बढ़ गई है।

माननीय प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में ‘विकसित भारत’ के संकल्प की चर्चा करते हुए राज्यपाल ने कहा कि आज के समय में अंतरराष्ट्रीय सहयोग का महत्व लगातार बढ़ रहा है। उन्होंने भारत की अध्यक्षता में नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का उल्लेख करते हुए इसे वैश्विक समुदाय के साथ भारत की सक्रिय और सुदृढ़ सहभागिता का उदाहरण बताया।
झारखण्ड की समृद्ध सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत
झारखण्ड राज्य की विशेषताओं पर बात करते हुए राज्यपाल महोदय ने कहा कि यह राज्य अपनी समृद्ध जनजातीय एवं सांस्कृतिक विरासत, प्राकृतिक सौंदर्य, वनों, झरनों, पहाड़ियों और प्रचुर खनिज संपदा के लिए विख्यात है। उन्होंने कहा कि यह धरती ‘धरती आबा’ भगवान बिरसा मुंडा और अनेक वीर स्वतंत्रता सेनानियों की भूमि है, जिन्होंने आजादी के आंदोलन में अभूतपूर्व योगदान दिया। उन्होंने विद्यार्थियों को अपने प्रवास के दौरान झारखण्ड की संस्कृति और प्रकृति को निकट से समझने व अनुभव करने के लिए प्रेरित किया।
मित्रता एवं आपसी समझ के सांस्कृतिक दूत
राज्यपाल ने विद्यार्थियों से कहा कि वे भारत में अपनी पढ़ाई और शोध के साथ-साथ यहाँ के इतिहास, विविध संस्कृति, परंपराओं और लोकतांत्रिक मूल्यों को भी समझें। उन्होंने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि वे केवल अपने देशों के छात्र नहीं हैं, बल्कि भारत और उनके संबंधित देशों के बीच मित्रता और आपसी समझ के सांस्कृतिक सेतु हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि सभी विद्यार्थी भारत की सुखद स्मृतियों को अपने साथ लेकर लौटेंगे और अपने अनुभवों को अपने देशवासियों के साथ साझा करेंगे।
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