तमाड़ में स्थित प्राचीन मंदिर से जुड़ी हैं कई धार्मिक मान्यताएं, रांची से करीब 60 किलोमीटर दूर है मंदिर

NEWS SAGA DESK

झारखंड के प्रसिद्ध मां दिउड़ी मंदिर में 16 भुजाओं वाली मां दुर्गा की प्रतिमा विराजमान है। जानिए मंदिर का इतिहास, धार्मिक मान्यताएं और इससे जुड़ी रोचक कथाएं।

झारखंड अपने घने जंगलों, पहाड़ों, आदिवासी संस्कृति और धार्मिक स्थलों के लिए जाना जाता है। राज्य में कई ऐसे मंदिर हैं, जिनसे जुड़ी प्राचीन कथाएं और मान्यताएं श्रद्धालुओं को आकर्षित करती हैं। इन्हीं में से एक है रांची जिले के तमाड़ क्षेत्र में स्थित मां दिउड़ी मंदिर। यहां मां दुर्गा की 16 भुजाओं वाली प्रतिमा विराजमान है, जो मंदिर की प्रमुख पहचान मानी जाती है। झारखंड के अलावा दूसरे राज्यों से भी श्रद्धालु यहां दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।

झारखंड के प्रसिद्ध मां दिउड़ी मंदिर

मंदिर से जुड़ी कई लोककथाएं प्रचलित हैं। इसके निर्माण, देवी के प्रकट होने और राजाओं से जुड़े प्रसंगों को लेकर अलग-अलग मान्यताएं सुनने को मिलती हैं। यही वजह है कि मां दिउड़ी मंदिर धार्मिक आस्था के साथ-साथ लोगों की जिज्ञासा का भी केंद्र बना हुआ है।

रांची-टाटा राजमार्ग पर स्थित है मां दिउड़ी मंदिर

मां दिउड़ी मंदिर रांची से लगभग 60 किलोमीटर दूर तमाड़ क्षेत्र में रांची-टाटा मार्ग पर स्थित है। सड़क मार्ग से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। मंदिर में मां दुर्गा की करीब साढ़े तीन फुट ऊंची 16 भुजाओं वाली प्रतिमा स्थापित है, जिसे श्रद्धालु सोलहभुजी देवी के नाम से भी जानते हैं।

मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए स्थानीय लोगों के साथ दूर-दराज से भी भक्त पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यता है कि सच्चे मन से मां के दरबार में प्रार्थना करने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इसी विश्वास के कारण मंदिर में सालभर श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है।

10वीं से 12वीं शताब्दी के बीच निर्माण की मान्यता

मां दिउड़ी मंदिर को प्राचीन मंदिरों में गिना जाता है। इसके निर्माण का समय आम तौर पर 10वीं से 12वीं शताब्दी के बीच बताया जाता है, हालांकि मंदिर के वास्तविक निर्माण काल को लेकर ऐतिहासिक पुष्टि जरूरी है। मंदिर की वास्तुकला में पत्थरों का इस्तेमाल इसकी प्राचीनता की ओर संकेत करता है।

मान्यता है कि मां दिउड़ी तमाड़ के राजपरिवार की कुलदेवी रही हैं। मंदिर परिसर में पारंपरिक पूजा-पद्धति के तहत अनुष्ठान किए जाते हैं। यहां आदिवासी परंपरा से जुड़े पाहन और अन्य पुजारियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। मंदिर की धार्मिक परंपराएं स्थानीय संस्कृति और आस्था के मेल को दर्शाती हैं। मंदिर में मां दुर्गा की पूजा के साथ भोग लगाने की परंपरा भी प्रचलित है। श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने पर मां को खीर या खिचड़ी का भोग चढ़ाते हैं। मंदिर में दोपहर के समय भोग अर्पित किए जाने की परंपरा बताई जाती है। इसके बाद पूजा और आरती की जाती है।

नवरात्र और अन्य धार्मिक अवसरों पर मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है। भक्त मां के दर्शन कर परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं। मां दिउड़ी मंदिर का नाम भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के साथ भी जोड़ा जाता है। रांची से संबंध रखने वाले धोनी के मंदिर में दर्शन करने की खबरें समय-समय पर चर्चा में रही हैं। उनके प्रशंसकों के बीच भी इस मंदिर को लेकर खास दिलचस्पी देखी जाती है।

स्थानीय स्तर पर ऐसी मान्यता प्रचलित है कि धोनी महत्वपूर्ण क्रिकेट मुकाबलों से पहले मां के दरबार में आशीर्वाद लेने पहुंचते रहे हैं। हालांकि, किसी खास मुकाबले से पहले या बाद में उनके मंदिर आने से जुड़ी घटनाओं की पुष्टि संबंधित अवसरों के विश्वसनीय रिकॉर्ड से की जानी चाहिए।

दिउड़ी मंदिर को लेकर प्रचलित हैं दो प्रमुख कथाएं

मंदिर की उत्पत्ति को लेकर कई लोककथाएं सुनाई जाती हैं। इनमें से एक कथा के अनुसार, एक भक्त को सपने में मंदिर के बारे में संकेत मिला। इसके बाद उसने जंगल में मंदिर की खोज शुरू की। काफी तलाश के बाद उसे घने जंगल के बीच मंदिर दिखाई दिया। उसने इसकी जानकारी ग्रामीणों को दी और धीरे-धीरे यह स्थान लोगों की आस्था का केंद्र बन गया।

एक अन्य लोककथा राजा केरा से जुड़ी है। कहा जाता है कि युद्ध में पराजित होकर लौट रहे राजा के सपने में देवी आईं और उन्होंने मंदिर बनवाने का निर्देश दिया। इसके बाद राजा ने मंदिर निर्माण कराने का आदेश दिया। कथा के अनुसार, मंदिर निर्माण के बाद राजा को अपना राज्य वापस मिल गया।

ये कथाएं स्थानीय जनश्रुतियों और धार्मिक मान्यताओं का हिस्सा हैं। इनके ऐतिहासिक तथ्यों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर ही की जा सकती है।

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