2026 लांसेट काउंटडाउन रिपोर्ट के अनुसार ग्लोबल वॉर्मिंग से भारत को 174 अरब डॉलर (16,541 अरब रुपये) का आर्थिक नुकसान हुआ है। जानें स्वास्थ्य, कृषि और श्रम क्षेत्र पर इसके गंभीर प्रभाव।
जलवायु परिवर्तन और लगातार बढ़ती ग्लोबल वॉर्मिंग अब सिर्फ एक पर्यावरणीय चेतावनी नहीं रह गई है, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था, जनस्वास्थ्य और आम नागरिकों के दैनिक जीवन पर सीधा प्रहार कर रही है। ‘2026 लांसेट काउंटडाउन ग्लोबल रिपोर्ट’ के अनुसार, बढ़ते तापमान और चरम मौसमी परिस्थितियों के कारण महज एक वर्ष के भीतर भारत को लगभग 174 अरब अमेरिकी डॉलर (करीब 16,541 अरब रुपये) का भारी-भरकम आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है।

यह क्षति भारत के कुल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 4.2 प्रतिशत है। तुर्किये के अंतल्या में होने वाले COP31 जलवायु सम्मेलन से ठीक पहले आई यह रिपोर्ट भारत में गंभीर स्वास्थ्य संकट और घटती कार्यक्षमता की डरावनी तस्वीर पेश करती है।
कृषि और श्रम क्षेत्र पर सबसे गहरी मार गर्मी और लू के बढ़ते दौर ने देश के श्रम क्षेत्र, खासकर असंगठित और मैदानी काम करने वाले श्रमिकों को बुरी तरह प्रभावित किया है। रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2016 से 2025 के बीच भारत में लोगों को प्रतिवर्ष औसतन 2,600 घंटे ऐसे जानलेवा मौसम में काम करना पड़ा, जब उन पर लू (हीटवेव) की चपेट में आने का सीधा खतरा था। यह 1990 के दशक की तुलना में 200 घंटे अधिक है।
इसी अवधि के दौरान भारत ने कुल 193 अरब श्रम घंटे (Labour Hours) गंवाए, जब अत्यधिक गर्मी के कारण मजदूर काम करने में असमर्थ रहे। इस नुकसान का सबसे बड़ा हिस्सा कृषि क्षेत्र को भुगतना पड़ा है। कुल बर्बाद हुए श्रम घंटों में से 68 प्रतिशत यानी 28.32 अरब घंटे कृषि क्षेत्र के थे। यही वजह है कि भारत की अर्थव्यवस्था को हुए 174 अरब डॉलर के कुल नुकसान में अकेले 54 प्रतिशत की चपत केवल कृषि क्षेत्र को लगी है।
स्वास्थ्य पर असर: बीमारियां, मौतें और नींद में खलल पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि तापमान में वृद्धि से शरीर में डीहाइड्रेशन, हीटस्ट्रोक, बेचैनी और दिल से जुड़ी बीमारियों का जोखिम काफी बढ़ गया है। इसके साथ ही, डेंगू, मलेरिया और हैजा फैलाने वाले बैक्टीरिया और मच्छर तेजी से पनप रहे हैं। वर्ष 2016 से 2025 के दौरान भारत में प्रतिवर्ष औसतन 10.6 दिन भीषण लू की स्थिति रही, जिसमें से 5.3 दिनों का सीधा संबंध जलवायु परिवर्तन से था।
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