JSSC कट ऑफ विवाद फिर चर्चा में है। सहायक आचार्य भर्ती में कट-ऑफ से अधिक अंक पाने वाले अभ्यर्थियों ने नियुक्ति नहीं मिलने पर सवाल उठाए हैं।
JSSC कट ऑफ विवाद एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) की विभिन्न नियुक्ति परीक्षाओं में परिणाम जारी होने के बाद लंबे समय तक कट-ऑफ अंक सार्वजनिक नहीं किए जाने की प्रक्रिया पर अभ्यर्थी लगातार सवाल उठा रहे हैं। हाल ही में सहायक आचार्य भर्ती परीक्षा के मामले ने इस बहस को और तेज कर दिया है। कई अभ्यर्थियों का दावा है कि उनके अंक जारी कट-ऑफ से अधिक हैं, फिर भी उन्हें नियुक्ति की अनुशंसा नहीं मिली। इससे चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।

JSSC कट ऑफ विवाद क्यों बना बड़ा मुद्दा?
झारखंड कर्मचारी चयन आयोग की कई भर्ती परीक्षाओं में परिणाम चरणबद्ध तरीके से जारी किए जाते रहे हैं। अधिकांश मामलों में अंतिम परिणाम और कट-ऑफ अलग-अलग समय पर प्रकाशित किए जाते हैं। अभ्यर्थियों का कहना है कि यदि परिणाम, प्राप्तांक और कट-ऑफ एक साथ जारी किए जाएं तो चयन प्रक्रिया अधिक पारदर्शी होगी और अनावश्यक विवादों से बचा जा सकेगा।
वर्तमान में 26 हजार सहायक आचार्य भर्ती परीक्षा इसका सबसे बड़ा उदाहरण मानी जा रही है। पिछले लगभग एक वर्ष से आयोग समय-समय पर अलग-अलग परिणाम जारी करता रहा है, लेकिन अब तक पूरी प्रक्रिया समाप्त नहीं हुई है।
सहायक आचार्य भर्ती में क्या है पूरा मामला?
राज्य में लगभग 26 हजार सहायक आचार्यों की नियुक्ति के लिए वर्ष 2023 में आवेदन आमंत्रित किए गए थे। इसके बाद वर्ष 2024 में परीक्षा आयोजित हुई और 2025 से परिणाम तथा प्रमाण-पत्र सत्यापन की प्रक्रिया शुरू हुई।
माध्यमिक सहायक आचार्य के 1373 पदों में से आयोग अब तक 800 से अधिक पदों पर नियुक्ति की अनुशंसा कर चुका है। शिक्षा विभाग नियुक्ति पत्र जारी करने की तैयारी भी कर रहा है। हालांकि आयोग ने यह स्पष्ट नहीं किया कि किन विषयों का अंतिम परिणाम जारी हो चुका है और किन अभ्यर्थियों का परिणाम अभी लंबित है।
आयोग द्वारा जारी सूचना में केवल इतना कहा गया कि कुछ अभ्यर्थियों का परिणाम आवश्यक प्रमाण-पत्रों या अभिलेखों की अनुपलब्धता अथवा अस्पष्टता के कारण लंबित रखा गया है। लेकिन यह जानकारी साझा नहीं की गई कि कितने अभ्यर्थियों का परिणाम रुका हुआ है और इसे कब तक जारी किया जाएगा।
कट-ऑफ जारी होने के बाद बढ़ा विवाद
JSSC कट ऑफ विवाद उस समय और गहरा गया जब 16 फरवरी 2026 को न्यायालय के आदेश के बाद कट-ऑफ अंक सार्वजनिक किए गए। तब तक लगभग 5000 से अधिक अभ्यर्थियों की नियुक्ति की अनुशंसा की जा चुकी थी।
कट-ऑफ जारी होने के बाद कई अभ्यर्थियों ने दावा किया कि उनके प्राप्तांक चयनित उम्मीदवारों के कट-ऑफ से अधिक हैं, फिर भी उनका चयन नहीं हुआ। कुछ उम्मीदवारों ने आयोग को लिखित रूप से अपनी आपत्तियां भी भेजी हैं। वहीं कई मामलों में न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया गया है।
अभ्यर्थियों की प्रमुख मांगें
भर्ती प्रक्रिया में शामिल अभ्यर्थियों का कहना है कि आयोग को भविष्य में ऐसी व्यवस्था लागू करनी चाहिए जिसमें अंतिम परिणाम, प्रत्येक अभ्यर्थी के प्राप्तांक और सभी श्रेणियों के कट-ऑफ अंक एक साथ जारी किए जाएं।
उनका मानना है कि इससे उम्मीदवार स्वयं अपने चयन या असफलता का कारण समझ सकेंगे और चयन प्रक्रिया को लेकर भ्रम तथा विवाद कम होंगे।
आयोग का आधिकारिक बयान
मीडिया द्वारा पूछे गए सवालों में आयोग से यह जानने की कोशिश की गई कि अधिकतर परीक्षाओं में कट-ऑफ परिणाम के साथ क्यों जारी नहीं किया जाता। साथ ही यह भी पूछा गया कि कट-ऑफ से अधिक अंक होने का दावा करने वाले अभ्यर्थियों की नियुक्ति क्यों नहीं हुई।
इस पर आयोग के सचिव ने संक्षिप्त प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सभी प्रश्न परीक्षा से संबंधित हैं। उन्होंने बताया कि फिलहाल वह बाहर हैं और पूरे मामले का अध्ययन करने के बाद विस्तृत जवाब देंगे।
पहले भी कई बार बदला परिणाम
सहायक आचार्य भर्ती परीक्षा का परिणाम कई चरणों में जारी किया गया। जुलाई 2025 में पहली बार परिणाम घोषित हुआ। इसके बाद अगस्त 2025 में संशोधित परिणाम जारी किया गया और उसी महीने फिर बदलाव किया गया। नवंबर और दिसंबर 2025 में अतिरिक्त परिणाम प्रकाशित हुए। फरवरी 2026 में भी नया परिणाम जारी हुआ, जबकि कट-ऑफ बाद में न्यायालय के आदेश के बाद प्रकाशित किया गया।
लगातार संशोधित परिणाम जारी होने से अभ्यर्थियों के बीच असमंजस की स्थिति बनी रही।
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JSSC कट ऑफ विवाद का सबसे बड़ा असर उन अभ्यर्थियों पर पड़ा है जो बेहतर अंक प्राप्त करने के बावजूद नियुक्ति से वंचित होने का दावा कर रहे हैं। इससे उम्मीदवारों में असंतोष बढ़ा है और चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आयोग भविष्य में परिणाम, मेरिट सूची, प्राप्तांक और कट-ऑफ को एक साथ सार्वजनिक करता है तो पारदर्शिता बढ़ेगी और न्यायिक विवादों में भी कमी आ सकती है।
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