National Handloom Day 2026 पर झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार ने कहा कि हस्तकरघा भारत की संस्कृति और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। बुनकरों को किया सम्मानित।
News Saga Desk
National Handloom Day 2026 के अवसर पर झारखंड के राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने हस्तकरघा को भारत की संस्कृति, परंपरा और आत्मनिर्भरता का सशक्त प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय हस्तकरघा दिवस देश के उन लाखों बुनकरों के श्रम, कौशल और सृजनशीलता को सम्मान देने का अवसर है, जिन्होंने सदियों से अपनी कला के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक पहचान को समृद्ध किया है।
राज्यपाल शुक्रवार को पूर्वी सिंहभूम जिले के जमशेदपुर स्थित माइकल जॉन सभागार में विवर्स डेवलपमेंट एंड रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन की ओर से आयोजित National Handloom Day 2026 कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने उत्कृष्ट कार्य करने वाले बुनकरों को सम्मानित भी किया।
भारत छोड़ो आंदोलन और हस्तकरघा की विरासत का किया उल्लेख
अपने संबोधन में राज्यपाल ने कहा कि राष्ट्रीय हस्तकरघा दिवस के अवसर पर वर्ष 1942 में शुरू हुए भारत छोड़ो आंदोलन को याद करना भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि उस दौर में चरखा, खादी और हस्तकरघा केवल वस्त्र निर्माण के साधन नहीं थे, बल्कि स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय स्वाभिमान के प्रतीक बन गए थे।
उन्होंने महात्मा गांधी के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि गांधीजी ने खादी और स्वदेशी को जनआंदोलन का रूप देकर देशवासियों में आत्मनिर्भरता और आत्मगौरव की भावना विकसित की थी।
झारखंड की तसर रेशम परंपरा की सराहना
राज्यपाल ने कहा कि झारखंड की जनजातीय और ग्रामीण संस्कृति में हस्तकरघा और हस्तशिल्प की समृद्ध विरासत मौजूद है। विशेष रूप से राज्य का तसर रेशम अपनी उत्कृष्ट गुणवत्ता के कारण पूरे देश में अलग पहचान रखता है।
उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक, नवाचार, आकर्षक डिजाइन, बेहतर विपणन और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से बुनकरों के उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है। इससे बुनकरों की आय बढ़ेगी और हस्तकरघा उद्योग को नई पहचान मिलेगी।
वस्त्र मंत्री के अनुभव किए साझा
National Handloom Day 2026 कार्यक्रम में राज्यपाल ने अपने सार्वजनिक जीवन के अनुभव भी साझा किए। उन्होंने कहा कि उन्हें बुनकर समाज के बीच जाकर उनकी समस्याओं को नजदीक से समझने का अवसर मिला।

उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार में वस्त्र मंत्री के रूप में कार्य करते समय उन्होंने बुनकरों के हित में कई पहल कीं। उनके अनुसार, उसी दौरान राष्ट्रीय हस्तकरघा दिवस मनाने की शुरुआत की गई थी, ताकि बुनकरों के योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिल सके और इस क्षेत्र को नई पहचान प्राप्त हो।
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केंद्र सरकार की योजनाओं का किया उल्लेख
राज्यपाल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में ‘वोकल फॉर लोकल’, ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘पीएम विश्वकर्मा योजना’ जैसी पहल के माध्यम से बुनकरों, शिल्पकारों और पारंपरिक कारीगरों को सशक्त बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि भारत की पारंपरिक कला और हस्तशिल्प केवल सांस्कृतिक विरासत ही नहीं, बल्कि विकसित भारत की आर्थिक शक्ति भी बन सकते हैं। इसके लिए सरकार, उद्योग और समाज को मिलकर कार्य करना होगा।
राज्यपाल ने हस्तकरघा क्षेत्र के समग्र विकास के लिए डिजाइन नवाचार, गुणवत्तापूर्ण उत्पादन, ब्रांडिंग, कौशल उन्नयन और युवाओं की सक्रिय भागीदारी को आवश्यक बताया।
उन्होंने विश्वास जताया कि शैक्षणिक संस्थानों, उद्योग जगत, स्वयंसेवी संगठनों और सरकार के संयुक्त प्रयासों से हस्तकरघा उद्योग को नई गति मिलेगी। इससे विशेष रूप से महिलाओं और ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार और आत्मनिर्भरता के नए अवसर सृजित होंगे।
कार्यक्रम के अंत में राज्यपाल ने नागरिकों से हस्तकरघा उत्पादों को अपनी दैनिक जीवनशैली का हिस्सा बनाने की अपील की।
उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति हस्तकरघा से निर्मित उत्पाद खरीदता है, तो वह केवल एक वस्त्र नहीं खरीदता, बल्कि एक बुनकर परिवार की आजीविका को मजबूत करने के साथ-साथ आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को भी मजबूती प्रदान करता है।
राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने कहा कि हस्तकरघा भारत की संस्कृति, परंपरा और आत्मनिर्भरता का सशक्त प्रतीक है। उन्होंने बुनकरों के लिए आधुनिक तकनीक, बेहतर विपणन, ब्रांडिंग और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़ने पर जोर देते हुए कहा कि सरकार, उद्योग और समाज के सामूहिक प्रयासों से हस्तकरघा क्षेत्र को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया जा सकता है।
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