सुप्रीम कोर्ट ने गृहणियों को ‘राष्ट्र निर्माता’ बताते हुए घरेलू कार्यों के आर्थिक महत्व को स्वीकार किया। मुआवजे के मामलों में 30,000 रुपये मासिक काल्पनिक आय मानने की बात कही।
News Saga Desk
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गृहणियों के योगदान को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए उन्हें ‘राष्ट्र निर्माता’ की संज्ञा दी है। अदालत ने कहा कि घर संभालने वाली महिलाएं परिवार और समाज की नींव मजबूत करती हैं तथा उनके बिना वेतन किए जाने वाले कार्यों का भी आर्थिक महत्व है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
जस्टिस संजय करोल और एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि घरेलू महिलाओं द्वारा किए जाने वाले कार्यों का मूल्यांकन केवल पैसों के आधार पर नहीं किया जा सकता, लेकिन मुआवजे से जुड़े मामलों में उनके योगदान को उचित महत्व दिया जाना चाहिए।
घरेलू सेवाओं के नुकसान को मिलेगी अलग पहचान
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि घर की देखभाल से जुड़े कार्यों के नुकसान को मुआवजे के निर्धारण में एक अलग श्रेणी के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए। अदालत ने इसके लिए गृहणियों की काल्पनिक मासिक आय 30,000 रुपये निर्धारित करने का भी निर्देश दिया, ताकि ऐसे मामलों में मुआवजे का आकलन अधिक न्यायसंगत तरीके से किया जा सके।
पीठ ने कहा कि परिवारों और समाज में गृहणियों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन अक्सर यह बिना किसी आर्थिक मूल्यांकन के रह जाता है। इसलिए घरेलू कार्यों के नुकसान को मुआवजा तय करते समय विशेष रूप से शामिल किया जाना चाहिए।
‘होममेकर’ ही नहीं, ‘राष्ट्र निर्माता’ भी
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि घरेलू महिलाएं केवल घर नहीं संभालतीं, बल्कि वे आने वाली पीढ़ियों का निर्माण करती हैं और राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ऐसे में ‘होममेकर’ शब्द को अब ‘राष्ट्र निर्माता’ की पहचान के साथ देखा जाना चाहिए।
अदालत ने यह भी कहा कि उसने इस संबंध में आवश्यक निर्देश जारी किए हैं और उम्मीद जताई है कि सभी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश इस विषय पर उचित निगरानी रखेंगे।
पति-पत्नी का रिश्ता बराबरी का
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व के एक फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि विवाह कोई ‘मालिक और नौकर’ का संबंध नहीं, बल्कि समानता और साझेदारी का रिश्ता है। अदालत ने स्पष्ट किया था कि पत्नी का घर का काम करने या खाना बनाने से इनकार करना क्रूरता की श्रेणी में नहीं आता।
कोर्ट ने यह भी कहा था कि घरेलू जिम्मेदारियां केवल महिलाओं की नहीं हैं, बल्कि घर के कामों में पति की भी समान भागीदारी होनी चाहिए। विवाह में दोनों पक्षों की जिम्मेदारियां बराबर होती हैं और घरेलू कार्यों का सम्मान किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी गृहणियों के योगदान को सामाजिक और आर्थिक स्तर पर नई पहचान देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
No Comment! Be the first one.