बिहार चुनाव 2025 : पीके के प्रत्याशियों में शामिल हो सकते हैं चिराग के करीबी, नवरात्र में होगी घोषणा

News Saga Desk

पटना। न तो प्रशांत किशोर (पीके) स्वयं चुनाव लड़ेंगे और न ही उनकी जन सुराज पार्टी (जसुपा) गठबंधन करेगी। यह आंतरिक निर्णय है। परिस्थितिवश इसमें मात्र यही संशोधन हो सकता है कि मित्रवत दलों के कुछ चहेतों को जसुपा अपना सिंबल दे दे। हालांकि, यह एक संभावना मात्र है, अंतिम निर्णय नहीं, क्योंकि जसुपा सभी सीटों के लिए प्रत्याशियों का चयन कर रही।

अंदरखाने उसके कुछ प्रत्याशी तय भी हो चुके हैं, लेकिन कई सीटों के लिए अभी योग्य अभ्यर्थी नहीं। चिराग पासवान से प्रशांत किशोर का सद्भाव यही काम आएगा। वैसे भी इस सौदे का लाभ दोतरफा है। एनडीए में चिराग को मुंहमांगी सीटें मिलने से रहीं। ऐसे में कुछ वैसे लोग जसुपा का बस्ता ढो सकते हैं, जिन्हें चिराग टिकट की आस बंधा चुके हैं। हालांकि, इसके लिए उन लोगों को भी आवेदन की प्रक्रिया से गुजरना होगा। प्रति आवेदन 21000 रुपये शुल्क निर्धारित है, फिर भी टिकट की गारंटी नहीं।

नवरात्र में जसुपा अपने प्रत्याशियों की घोषणा करेगी

प्रदेश अध्यक्ष मनोज भारती दावा कर रहे कि सबसे पहले जसुपा के प्रत्याशी ही घोषित होंगे। चूंकि निर्धारित मानदंडों पर योग्य अभ्यर्थियों की तलाश पूरी नहीं हुई, इसलिए देरी हो रही, अन्यथा 15 अगस्त तक सभी प्रत्याशी घोषित कर दिए जाने थे।

आवेदन तो जनवरी से ही लिए जा रहे। शिक्षा, सामाजिक कार्य, स्थानीय मुद्दों पर सक्रियता, और विकास-केंद्रित सोच आदि मानदंडों पर खरा उतरने वाला ही टिकट पाएगा। दर्जनभर सेवानिवृत्त आईएएस-आईपीएस अधिकारी भी टिकट की आस लगाए हुए हैं। प्राथमिकता उन्हें मिलेगी, जिन्होंने संगठन निर्माण में योगदान दिया है। यदि गलत प्रत्याशी चुना जाता है, तो पीके उसे वोट नहीं देने की अपील करेंगे। कारण यह कि मैदान से प्रत्याशी को वापस लेने की अभी कोई व्यवस्था नहीं।

टिकट वितरण में पारंपरिक जाति आधारित फार्मूला तो नहीं चलेगा, लेकिन योग्यता और स्वच्छ छवि के साथ जनसंख्या के अनुपात में सामाजिक हिस्सेदारी का पूरा ध्यान रहेगा। तीन स्तरों पर मूल्यांकन के बाद ही प्रत्याशी घोषित होंगे। विधानसभा क्षेत्र और जिला स्तर पर प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। केंद्रीय स्तर पर मूल्यांकन अंतिम चरण में है। अति-पिछड़ा वर्ग से कम-से-कम 75 और मुस्लिम समाज से 40 प्रत्याशी होंगे। 40 प्रतिशत (लगभग 97 सीटें) टिकट महिलाओं को मिलेंगे।

अनुसूचित जाति-जनजाति को आरक्षित सीटों के अतिरिक्त भी अवसर देने का प्रयास है। यह फार्मूला जाति-केंद्रित राजनीति को तोड़ने के उद्देश्य से है। इसी कारण पीके गठबंधन से परहेज कर रहे, क्योंकि सभी क्षेत्रीय दलों का जनाधार एक या दो-तीन जातियों तक सिमटा हुआ है।

पीके क्यों नहीं लड़ेंगे चुनाव?

स्वयं चुनाव लड़ने पर पीके अधिक समय तक एक ही क्षेत्र में सिमटकर रह जाएंगे। जसुपा के प्रचार-प्रसार का दारोमदार उन्हीं पर है। ऐसे में पूरे बिहार में पार्टी की संभावना प्रभावित हो सकती है।

गठबंधन से परहेज क्यों?

गठबंधन से भले ही तात्कालिक लाभ हो, लेकिन दूरगामी राजनीति के लिए वह बहुत उपयुक्त नहीं होता। विस्तार की संभावना में सहयोगियों की सीमाएं बाधा बन जाती हैं।


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