News Saga Desk
सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर बड़ा फैसला सुनाते हुए चुनाव आयोग की प्रक्रिया को वैध ठहराया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा कि मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण कराना चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए यह प्रक्रिया जरूरी है।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 324 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 21(3) चुनाव आयोग को मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण का अधिकार प्रदान करते हैं। अदालत ने कहा कि SIR प्रक्रिया जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में “नई जान फूंकने” का काम करती है और इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक शुद्ध, सटीक और विश्वसनीय बनाना है।
अदालत ने बताया क्यों जरूरी है SIR
फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिहार में चल रही SIR प्रक्रिया संविधान के उस मूल दायित्व का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना है। अदालत ने माना कि राज्य में बड़े पैमाने पर जनसांख्यिकीय बदलाव, शहरीकरण और प्रवासन के कारण मतदाता सूची में व्यापक परिवर्तन हुए हैं। ऐसे में मतदाता सूची को अपडेट और शुद्ध करने के लिए चुनाव आयोग द्वारा शुरू की गई प्रक्रिया उचित है।
दस्तावेज मांगने का मतलब नागरिकता पर सवाल नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाताओं से दस्तावेज या अतिरिक्त जानकारी मांगने का अर्थ यह नहीं है कि उनकी नागरिकता पर सवाल उठाया जा रहा है। अदालत ने कहा कि लोगों को अपनी जानकारी जोड़ने, सुधार करने तथा आपत्ति और अपील दर्ज करने के पर्याप्त अवसर दिए गए हैं।
कोर्ट ने कहा कि निष्पक्ष चुनाव केवल मतदान की प्रक्रिया तक सीमित नहीं होते, बल्कि उसकी सबसे मजबूत नींव सही और भरोसेमंद मतदाता सूची होती है। इसलिए वोटर लिस्ट को अपडेट और शुद्ध करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें खारिज
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि इतने बड़े स्तर पर SIR कराना जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के खिलाफ है और इससे मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि चुनाव आयोग की प्रक्रिया पूरी तरह कानून के दायरे में है और उसका उद्देश्य वैध एवं लोकतांत्रिक है।
चुनाव आयोग के लिए बड़ी कानूनी जीत
इस फैसले को बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले चलाए गए मतदाता सूची सुधार अभियान पर चुनाव आयोग के लिए बड़ी कानूनी जीत माना जा रहा है। साथ ही, यह निर्णय भविष्य में देशभर में मतदाता सूची पुनरीक्षण और चुनावी प्रक्रियाओं से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है।
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