News Saga Desk
लखनऊ की हालिया घटना ने एक बार फिर हमें झकझोर दिया है। हर बड़े हादसे के बाद कुछ दिनों तक चर्चा होती है, संवेदनाएँ व्यक्त की जाती हैं, जिम्मेदारियाँ तय करने की कोशिश होती है और फिर हम सब अपनी-अपनी दिनचर्या में लौट जाते हैं। लेकिन शायद सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर हम हादसों से सीखते क्यों नहीं हैं?

समस्या केवल किसी एक दुर्घटना, एक शहर या एक व्यवस्था की नहीं है। समस्या हमारी सामूहिक सोच में है। ऐसा प्रतीत होता है कि सुरक्षा हमारे लिए प्राथमिकता नहीं, बल्कि एक औपचारिकता बनकर रह गई है।
सड़कों पर देखिए। तेज गति से वाहन चलाना आज भी कई लोगों के लिए कौशल और साहस का प्रतीक है। ट्रैफिक नियमों का पालन करना समझदारी नहीं, बल्कि कमजोरी समझी जाती है। नाबालिग बच्चों को बाइक और स्कूटर थमा देना आम बात है। हेलमेट और सीट बेल्ट को सुरक्षा उपकरण नहीं, चालान से बचने का साधन माना जाता है। कुछ लोग जान जोखिम में डालकर स्टंट करते हैं, रफ्तार को रोमांच समझते हैं और फिर एक छोटी सी गलती पूरे परिवार की जिंदगी बदल देती है।
यही मानसिकता हमारे घरों, बाजारों और सार्वजनिक स्थानों में भी दिखाई देती है। घर बनाते समय अग्नि सुरक्षा, आपातकालीन निकास, विद्युत सुरक्षा या संरचनात्मक मजबूती पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। अधिकांश लोग यह मानकर चलते हैं कि दुर्घटना दूसरों के साथ होती है, हमारे साथ नहीं। जब तक कोई हादसा सामने न आ जाए, तब तक सुरक्षा पर खर्च करना अनावश्यक लगता है।
फूड सेफ्टी की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। सड़कों और बाजारों में बिक रहे भोजन की गुणवत्ता को लेकर लगातार सवाल उठते रहते हैं। मिलावट, अस्वच्छता और घटिया सामग्री का प्रयोग किसी से छिपा नहीं है। फिर भी उपभोक्ता के रूप में हम अक्सर सस्ते और चटपटे विकल्पों को प्राथमिकता देते हैं। विक्रेता जानता है कि ग्राहक स्वाद और कीमत देखेगा, गुणवत्ता नहीं। ग्राहक मानता है कि एक बार खाने से क्या फर्क पड़ जाएगा। इसी सोच के बीच स्वास्थ्य और सुरक्षा कहीं खो जाती है। हम स्वाद के पीछे भागते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि कई बार वही सस्ता विकल्प धीरे-धीरे हमारे शरीर में जहर घोल रहा होता है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि हमें आपातकालीन परिस्थितियों के लिए तैयार ही नहीं किया गया है। स्कूलों में वर्षों की शिक्षा के बावजूद अधिकांश लोग नहीं जानते कि आग लगने पर क्या करना चाहिए, भूकंप आने पर कहाँ खड़ा होना चाहिए, सड़क दुर्घटना के बाद घायल व्यक्ति की कैसे मदद करनी चाहिए या हृदयाघात की स्थिति में सीपीआर कैसे दिया जाता है।
हम गणित, विज्ञान और इतिहास पढ़ते हैं, लेकिन जीवन बचाने वाले बुनियादी कौशल नहीं सीखते। अधिकांश कार्यालयों, आवासीय परिसरों, स्कूलों और सार्वजनिक स्थलों पर आपदा प्रबंधन केवल कागज़ों तक सीमित है। फायर ड्रिल, इमरजेंसी इवैक्यूएशन और फर्स्ट एड प्रशिक्षण जैसी चीजें आज भी अपवाद हैं, सामान्य व्यवस्था नहीं।
दुनिया के कई देशों में आपातकालीन तैयारी नागरिक संस्कृति का हिस्सा है। लोग जानते हैं कि संकट की स्थिति में कैसे प्रतिक्रिया देनी है। हमारे यहाँ अक्सर स्थिति इसके विपरीत होती है, घटना होने के बाद अफरा-तफरी, भीड़, मोबाइल कैमरे और सहायता पहुँचने का इंतज़ार।
वास्तविकता यह है कि सुरक्षा कभी भी दुर्घटना के बाद शुरू नहीं होती। सुरक्षा की शुरुआत दुर्घटना होने से पहले होती है, सही निर्णयों से, थोड़े अतिरिक्त निवेश से, नियमों के पालन से और जोखिमों को समझने की संस्कृति से।
दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि हमने “जुगाड़” को व्यवस्था का विकल्प बना दिया है और “चलता है” को जीवन का सिद्धांत। हम सुरक्षित विकल्पों को महंगा समझते हैं और असुरक्षित विकल्पों को व्यावहारिक। हम अच्छी गुणवत्ता के सुरक्षा उपकरणों की जगह सस्ते विकल्प चुनते हैं, अधिकृत संस्थानों की जगह अनियमित सेवाओं पर भरोसा करते हैं और फिर उम्मीद करते हैं कि सब कुछ ठीक रहेगा।
एक विकसित और जिम्मेदार समाज की पहचान केवल उसकी ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों या आर्थिक प्रगति से नहीं होती। उसकी पहचान इस बात से होती है कि वह अपने नागरिकों की सुरक्षा को कितनी गंभीरता से लेता है।
समय आ गया है कि हम स्वयं से यह प्रश्न पूछें..क्या हम सचमुच सुरक्षित भारत बनाना चाहते हैं, या फिर हर बड़े हादसे के बाद कुछ दिन दुख व्यक्त करके उसे भूल जाने के आदी हो चुके हैं?
क्योंकि हादसे अचानक नहीं होते। वे हमारी छोटी-छोटी लापरवाहियों, गलत प्राथमिकताओं और सुरक्षा के प्रति उदासीनता का अंतिम परिणाम होते हैं।
सच्चाई कड़वी है, लेकिन स्वीकार करनी होगी, हमने विकास के बारे में बहुत सोचा, सुविधा के बारे में बहुत सोचा, बचत के बारे में बहुत सोचा, लेकिन सुरक्षा के बारे में सोचना लगभग बंद कर दिया है। और जब कोई बड़ा हादसा होता है, तब उसकी कीमत केवल पैसे से नहीं, बल्कि इंसानी ज़िंदगियों से चुकानी पड़ती है।
-ऋषभ आनंद
(सड़क सुरक्षा विशेषज्ञ)
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