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बिरसा कृषि विश्वविद्यालय रांची में खरीफ अनुसंधान परिषद की दो दिवसीय बैठक में कुलपति डॉ एससी दुबे ने युवा वैज्ञानिकों से नवोन्मेषी शोध पर ध्यान केंद्रित करने का आह्वान किया। किसानों की आय बढ़ाने, उत्पादन लागत घटाने और सहयोगात्मक अनुसंधान को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया गया।
बैठक में आवश्यकता आधारित अनुसंधान, अंतर विभागीय एवं अंतर-सांस्थानिक सहयोग को बढ़ावा देने के साथ-साथ किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए व्यावहारिक शोध पर विशेष जोर दिया गया। इस अवसर पर बीएयू के कुलपति डॉ एससी दुबे ने युवा वैज्ञानिकों से पारंपरिक शोध तक सीमित न रहकर नवोन्मेषी और प्रभावी अनुसंधान करने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि वैज्ञानिकों का शोध केवल शैक्षणिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसका प्रत्यक्ष लाभ किसानों और कृषि क्षेत्र को भी मिलना चाहिए। राज्य की जरूरतों और किसानों की वास्तविक समस्याओं को ध्यान में रखकर अनुसंधान करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
युवा वैज्ञानिक नवाचार पर दें विशेष ध्यान
बैठक को संबोधित करते हुए कुलपति डॉ एससी दुबे ने कहा कि युवा वैज्ञानिकों को नियमित और परंपरागत कार्यों के साथ-साथ ऐसे नए शोध विषयों पर काम करना चाहिए, जिनसे विज्ञान जगत में उनकी अलग पहचान बन सके। उन्होंने कहा कि नवाचार आधारित अनुसंधान से न केवल वैज्ञानिकों की प्रतिष्ठा बढ़ती है, बल्कि विश्वविद्यालय की भी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मजबूत होती है।
उन्होंने वैज्ञानिकों से आग्रह किया कि वे प्रत्येक वर्ष एक या दो बाह्य पोषित (Externally Funded) शोध परियोजनाएं लाने का प्रयास करें। इससे विश्वविद्यालय में शोध गतिविधियों को नई गति मिलेगी और आधुनिक तकनीकों के विकास के लिए अतिरिक्त संसाधन भी उपलब्ध होंगे।
विभागीय उद्देश्य के अनुरूप तैयार हों शोध प्रस्ताव
डॉ दुबे ने कहा कि शोध प्रस्ताव तैयार करते समय प्रत्येक विभाग को अपने निर्धारित उद्देश्यों (Mandate) का विशेष ध्यान रखना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अनुसंधान का विषय राज्य की कृषि, पशुपालन और वानिकी से जुड़ी चुनौतियों के समाधान में उपयोगी होना चाहिए।
उन्होंने विश्वविद्यालय के पशु एवं पक्षी प्रक्षेत्रों के बेहतर प्रबंधन और रखरखाव की आवश्यकता पर भी बल दिया। उनके अनुसार बेहतर शोध के लिए मजबूत प्रयोगशाला और आधुनिक प्रक्षेत्र सुविधाएं अत्यंत आवश्यक हैं।
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किसानों की जरूरतों से जुड़े हों शोध
बैठक में बाह्य विशेषज्ञ के रूप में शामिल भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के अवकाश प्राप्त सहायक महानिदेशक (पशु उत्पादन एवं प्रजनन) डॉ वीके सक्सेना ने कहा कि किसी भी शोध का उद्देश्य केवल शैक्षणिक प्रकाशन या डिग्री प्राप्त करना नहीं होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि शोध तभी सफल माना जाएगा, जब उसके निष्कर्ष और अनुशंसाएं सीमित संसाधनों वाले किसानों के लिए व्यवहारिक और उपयोगी साबित हों। वैज्ञानिकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनकी तकनीकें किसानों द्वारा आसानी से अपनाई जा सकें और उनसे उत्पादन लागत कम होने के साथ किसानों की आय में भी वृद्धि हो।
देशी मुर्गी नस्लों के संरक्षण पर जोर
डॉ वीके सक्सेना ने झारखंड की देशी मुर्गी नस्लों के संरक्षण और विकास पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि इन नस्लों का वैज्ञानिक चिह्नीकरण (Characterization), गुण निर्धारण (Trait Evaluation) और आधिकारिक पंजीकरण (Registration) किया जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि देशी मुर्गियों के पालन, प्रबंधन और पोषण से संबंधित आधुनिक तकनीकों का विकास किया जाए ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में मुर्गी पालन को अधिक लाभकारी बनाया जा सके।
सिरोही और पलामू नस्ल की बकरियों पर शोध की जरूरत
बैठक के दौरान डॉ सक्सेना ने पशुपालन क्षेत्र में भी कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए। उन्होंने कहा कि बेहतर गुणवत्ता वाले मांस और अधिक दूध उत्पादन के लिए सिरोही और पलामू नस्ल की बकरियों के संकरण (Cross Breeding) पर वैज्ञानिक शोध किया जाना चाहिए।
उन्होंने बताया कि इस दिशा में अनुसंधान से पशुपालकों की आय बढ़ाने और राज्य में बकरी पालन को अधिक लाभकारी व्यवसाय बनाने में मदद मिल सकती है।
विभिन्न विभागों ने प्रस्तुत की शोध उपलब्धियां
बैठक के दौरान विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों ने अपनी अनुसंधान गतिविधियों और उपलब्धियों की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की।
वानिकी संकाय के प्रो. कौशल कुमार तथा पशुगर्भ विज्ञान विभाग के प्रो. संजय कुमार रवि सहित पशु चिकित्सा एवं वानिकी संकाय के विभागाध्यक्षों ने अपने-अपने विभागों द्वारा किए जा रहे शोध कार्यों, उपलब्धियों और भविष्य की योजनाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला।
पूर्व विशेषज्ञों ने दिए महत्वपूर्ण सुझाव
बैठक में बीएयू के पूर्व कुलपति डॉ जीएस दुबे, पूर्व अनुसंधान निदेशक डॉ डीके सिंह द्रोण तथा अवकाश प्राप्त डीन डॉ बीके राय भी उपस्थित रहे।
इन वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने विश्वविद्यालय में चल रहे अनुसंधान कार्यों को और अधिक प्रभावी, परिणामोन्मुख तथा किसान-केंद्रित बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए। उन्होंने शोध की गुणवत्ता सुधारने, नई तकनीकों को अपनाने और विभिन्न संस्थानों के साथ सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया।
सहयोगात्मक अनुसंधान पर विशेष जोर
बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि अंतर विभागीय (Inter-Departmental) और अंतर-सांस्थानिक (Inter-Institutional) सहयोग को बढ़ावा दिया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना था कि विभिन्न संस्थानों में उपलब्ध विशेषज्ञता, प्रयोगशालाओं और संसाधनों का साझा उपयोग करने से बेहतर शोध परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।
इससे झारखंड के किसानों के लिए उपयोगी तकनीकों का विकास तेज होगा और कृषि, पशुपालन तथा वानिकी क्षेत्रों में नई संभावनाएं भी खुलेंगी।
बैठक का समन्वयन बीएयू के अनुसंधान निदेशक डॉ पीके सिंह ने किया। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय भविष्य में किसानों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अधिक उपयोगी, तकनीक आधारित और परिणामोन्मुख अनुसंधान को प्राथमिकता देगा।
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