सिक्किम टनल हादसा में पश्चिमी सिंहभूम के मसीह बरजो की मौत से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। पत्नी और बच्चों के सामने अब जीवन का संकट है।
सिक्किम टनल हादसा में मसीह बरजो की मौत से टूटा परिवार का सहारा
झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के बंदगांव प्रखंड स्थित मदुरा गांव के रहने वाले मसीह बरजो की मौत ने उनके परिवार को गहरे संकट में डाल दिया है। रोजी-रोटी की तलाश में हजारों किलोमीटर दूर सिक्किम गए मसीह बरजो की नामची जिले में सुरंग निर्माण कार्य के दौरान हुए हादसे में जान चली गई। परिवार अब उनके पार्थिव शरीर के गांव लौटने का इंतजार कर रहा है, लेकिन उनके जाने से पत्नी मंगरी बरजो और पांच बच्चों के सामने जीवन यापन की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
मदुरा गांव में इस घटना के बाद शोक का माहौल है। ग्रामीणों के अनुसार मसीह मेहनती, सरल और जिम्मेदार व्यक्ति थे। परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने और बच्चों के बेहतर भविष्य के सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने घर से दूर जाकर मजदूरी करने का फैसला लिया था।

आर्थिक मजबूरी में छोड़ा था घर
मसीह बरजो के परिवार की आर्थिक स्थिति पहले से ही कमजोर थी। घर में खेती की सुविधा नहीं थी और स्थायी रोजगार का कोई साधन भी नहीं था। परिवार का खर्च चलाने के लिए मजदूरी ही एकमात्र सहारा थी। इसी वजह से मसीह ने सिक्किम जाकर काम करने का निर्णय लिया।
परिवार के लोगों ने उन्हें बाहर जाने से रोकने की कोशिश की थी। पत्नी मंगरी बरजो और बेटे दयाल बरजो चाहते थे कि वह गांव में रहकर ही कोई काम करें, लेकिन परिवार की जरूरतों को देखते हुए मसीह ने बाहर जाने का फैसला किया।
घर से निकलते समय उन्होंने पत्नी से कहा था कि अगर वह काम करने नहीं जाएंगे तो परिवार का पेट कैसे भरेगा। आज वही बात परिवार के लोगों को बार-बार याद आ रही है।
सिक्किम टनल हादसा ने छीन लिया परिवार का सहारा
मसीह बरजो मजदूरी कर अपने परिवार का पालन-पोषण करते थे। उनका सपना था कि बच्चों की पढ़ाई जारी रहे और घर की हालत धीरे-धीरे बेहतर हो। लेकिन सिक्किम टनल हादसा ने परिवार की सारी उम्मीदों को तोड़ दिया।
हादसे की खबर मिलने के बाद मदुरा गांव में मातम फैल गया। ग्रामीणों का कहना है कि मसीह हमेशा परिवार की जिम्मेदारियों को प्राथमिकता देते थे। उन्होंने बेहतर भविष्य की उम्मीद में घर छोड़ा था, लेकिन वापस उनका शव लौट रहा है।
घर में खत्म हुआ अनाज, बच्चों के भविष्य पर संकट
पत्नी मंगरी बरजो ने बताया कि सिक्किम जाने से पहले मसीह ने किसी तरह व्यवस्था कर एक बोरा चावल घर में रखा था। उन्हें उम्मीद थी कि मजदूरी मिलने के बाद वह पैसे भेजेंगे और परिवार का खर्च चलता रहेगा।
लेकिन कई महीने बीत जाने के बाद न तो पैसे आए और अब घर में रखा अनाज भी खत्म हो चुका है। पति की मौत के बाद परिवार के सामने खाने-पीने की समस्या खड़ी हो गई है।
मंगरी बरजो ने बताया कि उनके पास कोई स्थायी आय का साधन नहीं है। बच्चों की देखभाल और घर चलाने की जिम्मेदारी अब उनके लिए सबसे बड़ी चिंता बन गई है।
ताबूत में लौटेगा पार्थिव शरीर, रास्ते में भी परेशानी
मसीह बरजो का पार्थिव शरीर गांव तक पहुंचाना भी चुनौती बन गया है। बारिश के कारण कारो नदी में पानी बढ़ गया है, जिससे गांव तक पहुंचने में परेशानी हो रही है।
जानकारी के अनुसार शव को रनिया से चेंगड़े, जलमंडी और गंजना होते हुए बंदगांव लाया जाएगा। इसके बाद मदुरा गांव तक करीब पांच किलोमीटर का रास्ता जंगल, पहाड़ी और कच्चे मार्ग से होकर गुजरता है। इस रास्ते पर चारपहिया वाहन पहुंचना मुश्किल है। ऐसे में ग्रामीणों को शव को कंधे पर उठाकर गांव तक ले जाना पड़ सकता है।
झोपड़ी में गुजर रही परिवार की जिंदगी
मंगरी बरजो अपने बच्चों के साथ बेहद कठिन परिस्थितियों में जीवन गुजार रही हैं। परिवार लकड़ी के पटरे और मिट्टी से बनी छोटी झोपड़ी में रहता है, जिसके ऊपर प्लास्टिक का तिरपाल लगाया गया है।
घर की कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित होने का खतरा बढ़ गया है। मसीह बरजो के पीछे पत्नी और पांच बच्चे हैं। बड़ा बेटा विजय बरजो रांची में मजदूरी करता है। वहीं दयाल, अजय, रीता और छोटी बेटी चंदना गांव में रहते हैं।
ग्रामीणों ने सरकार से मांगी सहायता
मसीह बरजो की मौत के बाद ग्रामीणों ने प्रशासन और सरकार से परिवार की मदद की मांग की है। जलासार पंचायत के पूर्व उपमुखिया और समाजसेवी बासू बरजो ने कहा कि मसीह की मजदूरी से ही परिवार का पूरा खर्च चलता था।
ग्रामीणों ने परिवार के लिए आर्थिक सहायता, राशन, आवास सुविधा और बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए मदद उपलब्ध कराने की मांग की है। उनका कहना है कि ऐसे समय में परिवार को सरकारी सहयोग की जरूरत है।
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हादसे का सामाजिक असर और आगे की चुनौती
सिक्किम टनल हादसा केवल एक मजदूर की मौत नहीं, बल्कि उस परिवार की पूरी जिंदगी बदल देने वाली घटना है जो एक व्यक्ति की कमाई पर निर्भर था। ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में मजदूर रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में जाते हैं। ऐसे हादसे उनके परिवारों को लंबे समय तक आर्थिक और मानसिक संकट में डाल देते हैं।
मसीह बरजो का परिवार अब सरकारी सहायता और समाज के सहयोग की उम्मीद लगाए बैठा है। गांव के लोग चाहते हैं कि परिवार को समय पर मदद मिले ताकि बच्चों की पढ़ाई और जीवन की बुनियादी जरूरतें पूरी हो सकें।
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