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पश्चिमी सिंहभूम उपभोक्ता आयोग ने चिकित्सकीय लापरवाही मानते हुए चाईबासा के आशा नर्सिंग होम के संचालक को 45 दिनों के भीतर 11 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया।

पश्चिमी सिंहभूम जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने Chaibasa Medical Negligence मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए चाईबासा स्थित आशा नर्सिंग होम के संचालक एवं सामान्य शल्य चिकित्सक डॉ. अरुण कुमार को शिकायतकर्ता सत्यनारायण बोइपाई को कुल 11 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। आयोग ने अपने बहुमत के फैसले में माना कि उपचार के दौरान अपेक्षित चिकित्सकीय मानकों और निर्धारित प्रक्रियाओं का समुचित पालन नहीं किया गया, जिसके परिणामस्वरूप मरीज की मृत्यु हुई।
आयोग ने आदेश दिया है कि डॉ. अरुण कुमार 45 दिनों के भीतर शिकायतकर्ता को 10 लाख रुपये मानसिक पीड़ा, उत्पीड़न एवं क्षति के एवज में तथा 1 लाख रुपये वाद व्यय के रूप में अदा करें। यदि निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं किया जाता है तो पूरी राशि पर 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देय होगा।
आयोग ने बहुमत से सुनाया फैसला
Chaibasa Medical Negligence मामले का फैसला आयोग के अध्यक्ष सुनील कुमार सिंह और महिला सदस्य देवश्री चौधरी ने बहुमत से सुनाया। हालांकि आयोग के पुरुष सदस्य ने इस मामले में अलग राय रखते हुए शिकायत को खारिज करने की अनुशंसा की थी, लेकिन उपभोक्ता आयोग के नियमों के अनुसार बहुमत का निर्णय ही अंतिम माना गया।
आयोग ने उपलब्ध दस्तावेजों, गवाहों के बयान और पूरे घटनाक्रम का विश्लेषण करने के बाद शिकायतकर्ता के पक्ष में निर्णय दिया।
यह मामला ओडिशा के मयूरभंज जिले के देवगाम निवासी सत्यनारायण बोइपाई द्वारा दायर परिवाद से जुड़ा है। शिकायत के अनुसार उनकी पत्नी सुनीता देवगम को 11 जून 2024 को प्रसव पीड़ा होने पर चाईबासा स्थित आशा नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया था।
शिकायतकर्ता का आरोप था कि अस्पताल में विशेषज्ञ स्त्री रोग विशेषज्ञ, प्रशिक्षित नर्स और आवश्यक चिकित्सकीय सुविधाओं के अभाव में शल्य क्रिया (ऑपरेशन) की गई। ऑपरेशन के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव होने से मरीज की हालत गंभीर हो गई।
बाद में उन्हें टाटा मुख्य अस्पताल (टीएमएच), जमशेदपुर रेफर किया गया और वहां से आगे बेहतर इलाज के लिए राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स), रांची भेजा गया, जहां 17 जून 2024 को उपचार के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।
डॉक्टर ने आरोपों से किया इनकार
सुनवाई के दौरान डॉ. अरुण कुमार ने सभी आरोपों का खंडन किया। उन्होंने आयोग के समक्ष कहा कि मरीज पहले से ही अत्यंत गंभीर और उच्च जोखिम वाली अवस्था में थी।
उनके अनुसार, अपरा (प्लेसेंटा) के समय से पहले अलग हो जाने जैसी गंभीर चिकित्सा स्थिति के कारण तत्काल शल्य प्रसव करना आवश्यक था। उन्होंने दावा किया कि ऑपरेशन सफल रहा और स्वस्थ शिशु का जन्म हुआ।
डॉक्टर का कहना था कि बाद में संक्रमणजनित आघात (सेप्टिक शॉक), बहु-अंग विफलता (मल्टी ऑर्गन फेल्योर) तथा रक्त के थक्के बनने की गंभीर समस्या जैसी जटिलताओं के कारण मरीज की स्थिति लगातार बिगड़ती चली गई।
दोनों पक्षों ने पेश किए साक्ष्य
Chaibasa Medical Negligence मामले की सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता की ओर से परिजनों के शपथपत्र और अन्य दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत किए गए।
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वहीं बचाव पक्ष की ओर से डॉ. अरुण कुमार, वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. एस.एल. कुंकल तथा नर्सिंग होम के एक कर्मचारी के बयान आयोग के समक्ष दर्ज कराए गए। आयोग ने दोनों पक्षों की दलीलों और दस्तावेजों पर विचार करने के बाद अपना निर्णय सुनाया।
आयोग के अध्यक्ष सुनील कुमार सिंह और महिला सदस्य देवश्री चौधरी ने अपने निर्णय में कहा कि शिकायतकर्ता स्वतंत्र विशेषज्ञ चिकित्सक की राय प्रस्तुत नहीं कर सका, लेकिन उपलब्ध दस्तावेजी साक्ष्य, गवाहों के बयान और पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता है कि उपचार के दौरान अपेक्षित चिकित्सकीय मानकों का समुचित पालन नहीं किया गया।
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