NEWS SAGA DESK
क्रिकेट के तीनों फॉर्मेट की अपनी अलग पहचान है। टी-20 और वनडे में खिलाड़ी रंगीन जर्सी और सफेद गेंद के साथ मैदान पर उतरते हैं, जबकि टेस्ट क्रिकेट में आज भी सफेद कपड़े और लाल गेंद का इस्तेमाल होता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि टेस्ट में यही संयोजन क्यों रखा गया

दरअसल, इसकी जड़ें क्रिकेट के पुराने दौर से जुड़ी हैं। टेस्ट क्रिकेट की शुरुआत के समय रंगीन जर्सी का चलन नहीं था। खिलाड़ी आमतौर पर सफेद या हल्के रंग के कपड़े पहनते थे। लंबे समय तक चलने वाले मैचों के कारण यही पोशाक धीरे-धीरे टेस्ट क्रिकेट की परंपरा बन गई।
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अब बात लाल गेंद की टेस्ट मैच कई दिनों तक चलता है और गेंद को लंबे समय तक इस्तेमाल किया जाता है। लाल गेंद को इस तरह तैयार किया जाता है कि वह लंबे स्पेल के दौरान अपना आकार और सीम काफी हद तक बनाए रख सके। इसके अलावा सफेद कपड़ों के सामने लाल गेंद साफ दिखाई देती है, जिससे बल्लेबाज और फील्डर दोनों के लिए उसे देखना आसान रहता है।
टेस्ट क्रिकेट में गेंद का व्यवहार भी मुकाबले की रणनीति बदलता रहता है। नई गेंद शुरुआत में तेज गेंदबाजों को स्विंग और सीम कराने में मदद कर सकती है। जैसे-जैसे गेंद पुरानी होती जाती है, उसकी चमक और सतह में बदलाव आता है, जिससे खेल का समीकरण भी बदल सकता है। एक निश्चित संख्या में ओवर पूरे होने के बाद गेंदबाजी टीम को नई गेंद लेने का विकल्प भी मिलता है।

वहीं, वनडे और टी-20 में सफेद गेंद का इस्तेमाल रंगीन जर्सी के कारण ज्यादा व्यावहारिक है। खासकर सीमित ओवरों के क्रिकेट में दिन-रात के मुकाबलों के दौरान सफेद गेंद रंगीन कपड़ों और मैदान की पृष्ठभूमि के सामने ज्यादा स्पष्ट नजर आती है। डे-नाइट टेस्ट में हालांकि एक दिलचस्प बदलाव हुआ है। यहां खिलाड़ियों की ड्रेस सफेद ही रहती है, लेकिन लाल गेंद की जगह गुलाबी गेंद इस्तेमाल की जाती है। कृत्रिम रोशनी में गुलाबी गेंद को बेहतर दृश्यता देने के लिए चुना गया है।
यानी सफेद कपड़े और लाल गेंद सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि टेस्ट क्रिकेट की खेल परिस्थितियों से जुड़ी पहचान हैं। पांच दिन का मुकाबला, बदलती गेंद की स्थिति और सफेद पोशाक ये सभी मिलकर टेस्ट क्रिकेट को बाकी फॉर्मेट से अलग बनाते हैं।
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