भारतीय शेयर बाजार अच्छी GDP के बावजूद दबाव में है। महंगा वैल्यूएशन, कमजोर रुपया, विदेशी बिकवाली और कच्चे तेल की कीमतें बाजार को रोक रही हैं।
दुनिया के कई शेयर बाजारों में तेजी का माहौल है, लेकिन भारतीय शेयर बाजार क्यों नहीं भाग रहा यह सवाल इन दिनों निवेशकों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। खास बात यह है कि वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में भारत की जीडीपी 7.8% रही है, जो अर्थव्यवस्था की मजबूत तस्वीर पेश करती है। इसके बावजूद निफ्टी और सेंसेक्स में वैसी तेजी देखने को नहीं मिल रही, जैसी अमेरिका, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे बाजारों में नजर आ रही है।

पिछले करीब दो वर्षों में निफ्टी 26,000 से 23,000 के दायरे में उतार-चढ़ाव करता रहा है। ऐसे में निवेशकों के सामने बड़ा सवाल है कि मजबूत आर्थिक आंकड़ों के बावजूद शेयर बाजार की रफ्तार क्यों थमी हुई है। इसकी वजह एक नहीं, बल्कि कई वैश्विक और घरेलू कारकों का एक साथ असर है।
कच्चे तेल ने बढ़ाई भारतीय बाजार की चिंता
भारतीय शेयर बाजार क्यों नहीं भाग रहा, इसे समझने के लिए सबसे पहले कच्चे तेल की कीमतों पर नजर डालना जरूरी है। मध्य पूर्व में जारी तनाव के कारण तेल की कीमतों में तेजी आई है। दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर भारत के आयात बिल, रुपये और महंगाई पर पड़ता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ा तनाव और आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ने पर तेल की कीमतों में और दबाव बन सकता है। महंगा तेल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती है और इसका असर कंपनियों की लागत तथा मुनाफे पर भी पड़ सकता है।
भारतीय शेयर बाजार क्यों नहीं भाग रहा, इसका एक बड़ा कारण उसका अपेक्षाकृत महंगा वैल्यूएशन भी है। भारतीय बाजार के कई शेयर लंबे समय से ऊंचे मूल्यांकन पर कारोबार कर रहे हैं।
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ऐसे में जब निवेशकों के सामने कच्चे तेल की बढ़ती कीमत, ब्याज दर, कमजोर रुपया और वैश्विक तनाव जैसी चुनौतियां हों, तो मुनाफावसूली स्वाभाविक है।
महंगे बाजार में निवेशकों को भविष्य की कमाई के मुकाबले शेयर की मौजूदा कीमत अधिक लगने लगे तो नई खरीदारी की रफ्तार धीमी हो सकती है। यही स्थिति व्यापक बाजार की तेजी को सीमित कर सकती है।
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