बांकुड़ा के शालबेड़िया गांव में भगवान विश्वकर्मा की अनोखी पूजा होती है। यहां देवशिल्पी पंचमुखी और दशभुज स्वरूप में हैं और उनका वाहन हंस है।
News Saga Desk
भगवान विश्वकर्मा की पूजा आमतौर पर चतुर्भुज प्रतिमा और हाथी वाहन के साथ की जाती है। लेकिन पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा जिले के एक गांव में देवशिल्पी विश्वकर्मा की पूजा बिल्कुल अलग स्वरूप में होती है। यहां भगवान विश्वकर्मा पंचमुखी और दशभुज स्वरूप में विराजमान हैं और उनका वाहन हाथी नहीं बल्कि हंस है। बांकुड़ा के गंगाजलघाटी प्रखंड की कपिष्ठा ग्राम पंचायत के शालबेड़िया गांव में लंबे समय से इसी विशेष स्वरूप की पूजा की जा रही है।
पंचमुखी और दशभुज स्वरूप में विराजते हैं विश्वकर्मा
शालबेड़िया गांव में भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा पांच मुख और दस हाथों वाली होती है। उनके दस हाथों में वेद, सुदर्शन चक्र, त्रिशूल, गदा, शंख, हथौड़ा, तुलादंड और कमंडलु समेत अलग-अलग वस्तुएं दिखाई जाती हैं।

भगवान विश्वकर्मा के दोनों ओर देवी लक्ष्मी और देवी सरस्वती की प्रतिमाएं भी विराजमान रहती हैं। सबसे खास बात उनका वाहन है। यहां देवशिल्पी विश्वकर्मा के वाहन के रूप में हंस को स्थापित किया जाता है।
किसी थीम पर आधारित नहीं है यह पूजा
शालबेड़िया की यह अनोखी विश्वकर्मा पूजा किसी आधुनिक थीम या नए प्रयोग का हिस्सा नहीं है। स्थानीय लोगों के अनुसार, गांव में कई पीढ़ियों से इसी स्वरूप में भगवान विश्वकर्मा की आराधना होती आ रही है।
गांव के बुजुर्गों का कहना है कि स्वतंत्रता से पहले से ही यहां विश्वकर्मा पूजा का आयोजन किया जाता रहा है। इस परंपरा की शुरुआत गांव के कर्मकार समुदाय से जुड़ी बताई जाती है।
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कर्मकार समाज के लिए खास है विश्वकर्मा पूजा
शालबेड़िया में विश्वकर्मा पूजा का संबंध स्थानीय कर्मकार समुदाय की पारंपरिक शिल्पकारी से भी जुड़ा हुआ है। कांसा के बर्तन बनाने सहित विभिन्न कारीगरी के काम से जुड़े कर्मकार समुदाय के लिए भगवान विश्वकर्मा सृष्टि और शिल्प के देवता के रूप में आराध्य हैं।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, विश्वकर्मा का पंचमुखी स्वरूप अलग-अलग प्रकार के शिल्प और शिल्पकारों का प्रतीक है। इनमें लोहा, लकड़ी, सोना और पत्थर जैसे विभिन्न शिल्प शामिल माने जाते हैं।
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