ग्रेटर नोएडा के संजय ने करवा चौथ के मौके पर अपनी पत्नी रूबी को किडनी दान कर नई जिंदगी दी है। अलग-अलग ब्लड ग्रुप (A+ और B+) होने के बावजूद डॉक्टरों ने सफल ट्रांसप्लांट किया।
भारत में करवा चौथ का पर्व पति-पत्नी के अटूट रिश्ते, प्रेम और एक-दूसरे की लंबी उम्र की दुआओं का प्रतीक माना जाता है। अमूमन इस दिन महिलाएं अपने पति की सेहत और दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा से एक ऐसी सच्ची और प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जिसने इस त्योहार के मायने को एक नया आयाम दे दिया है।

ग्रेटर नोएडा के रहने वाले संजय और उनकी पत्नी रूबी की यह कहानी त्याग, समर्पण और असीम प्रेम की एक ऐसी मिसाल है, जो हर किसी की आंखें नम कर दे। जब रूबी की जिंदगी गंभीर बीमारी के साए में और डायलिसिस के सहारे चल रही थी, तब उनके पति संजय ने अपनी एक किडनी दान कर उन्हें मौत के मुंह से बाहर निकाल लिया।
दोनों किडनियां खराब होने से मुश्किल हुई थी रूबी की जिंदगी
रूबी लंबे समय से स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही थीं। कुछ समय पहले मेडिकल जांच में पता चला कि उनकी दोनों किडनियां (Kedneys Failure) पूरी तरह से काम करना बंद कर चुकी हैं। इस खुलासे ने पूरे परिवार को झकझोर कर रख दिया। रूबी की जिंदगी अब केवल नियमित डायलिसिस (Dialysis) के सहारे ही बची थी।
दैनिक जीवन की यह जद्दोजहद और पत्नी की तकलीफें पति संजय से देखी नहीं गईं। उन्होंने बिना एक पल गंवाए अपनी पत्नी को बचाने का कड़ा फैसला लिया और अपनी एक किडनी दान (Kidney Donation) करने की इच्छा जताई। संजय का यह निर्णय उनके परिवार के लिए इस अंधेरे दौर में उम्मीद की सबसे बड़ी किरण साबित हुआ।
अलग-अलग ब्लड ग्रुप: डॉक्टरों के सामने थी बड़ी चुनौती
इस पूरे मामले में मेडिकल टीम के सामने एक बड़ी तकनीकी चुनौती भी थी। आमतौर पर किडनी ट्रांसप्लांट के लिए डोनर और रिसीवर का ब्लड ग्रुप मैच होना जरूरी होता है, लेकिन रूबी और संजय के मामले में यह अलग था।
- रूबी का ब्लड ग्रुप: B पॉजिटिव
- संजय का ब्लड ग्रुप: A पॉजिटिव
अलग-अलग ब्लड ग्रुप होने के कारण शरीर द्वारा अंग को अस्वीकार (Organ Rejection) करने का खतरा बहुत अधिक होता है। इस जटिल चुनौती से पार पाने के लिए चिकित्सकों ने एक विशेष चिकित्सकीय प्रक्रिया का सहारा लिया। डॉक्टरों ने रूबी को ‘डी-सेंसिटाइजेशन ट्रीटमेंट’ (Desensitization Treatment) दिया। इस उन्नत चिकित्सा प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य मरीज के शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) को नियंत्रित करना था, ताकि नई किडनी को शरीर आसानी से स्वीकार कर सके और किसी प्रकार का जोखिम न रहे।
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