Jagannath Snan Yatra 2026 के तहत जमशेदपुर में 108 कलशों से भगवान जगन्नाथ का महास्नान हुआ। 56 भोग अर्पित किए गए, अब 15 दिन अनवसर के बाद रथयात्रा होगी
Jagannath Snan Yatra 2026: 108 कलशों से भगवान जगन्नाथ का महास्नान
जमशेदपुर में ज्येष्ठ पूर्णिमा के अवसर पर Jagannath Snan Yatra 2026 के तहत इस्कॉन जमशेदपुर ने धालभूम क्लब में भव्य देव स्नान महोत्सव का आयोजन किया। भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा का 108 पवित्र कलशों से वैदिक मंत्रोच्चार और हरिनाम संकीर्तन के बीच महास्नान कराया गया। शंखध्वनि, मृदंग और “हरे कृष्ण-हरे राम” महामंत्र से पूरा परिसर भक्तिमय हो उठा।
ज्येष्ठ पूर्णिमा पर क्यों होता है देव स्नान?
जगन्नाथ संस्कृति में ज्येष्ठ पूर्णिमा का विशेष धार्मिक महत्व है। इसी दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का सार्वजनिक स्नान कराया जाता है। इसे विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा महापर्व की औपचारिक शुरुआत माना जाता है। इस्कॉन जमशेदपुर ने भी परंपरागत वैदिक विधि-विधान के अनुसार सभी धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए।

108 कलशों में विशेष औषधीय मिश्रण
महास्नान के लिए 108 कलशों में गंगाजल, पंचामृत, चंदन, अश्वगंधा, नारियल जल और विभिन्न फलों के रस का विशेष मिश्रण तैयार किया गया था। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह अभिषेक भगवान को शीतलता प्रदान करने के साथ दिव्यता और औषधीय गुणों का प्रतीक भी माना जाता है। अभिषेक के दौरान हजारों श्रद्धालुओं ने हरिनाम संकीर्तन में भाग लिया।
56 भोग के बाद 15 दिन रहेंगे अनवसर में
महास्नान के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को 56 प्रकार के पारंपरिक व्यंजनों का महाभोग अर्पित किया गया। इसके बाद परंपरा के अनुसार भगवान को 15 दिनों के लिए अनवसर (एकांतवास) में विराजमान कराया गया। इस अवधि में मंदिर के पट सामान्य दर्शन के लिए बंद रहेंगे और भगवान को औषधीय काढ़ा अर्पित किया जाएगा।
नेत्रोत्सव के बाद निकलेगी भव्य रथयात्रा
अनवसर अवधि समाप्त होने के बाद नेत्रोत्सव के अवसर पर भगवान नवयौवन स्वरूप में भक्तों को दर्शन देंगे। इसके बाद आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को भगवान जगन्नाथ भव्य रथयात्रा के माध्यम से नगर भ्रमण पर निकलेंगे।
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बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालु
इस धार्मिक आयोजन का नेतृत्व इस्कॉन जमशेदपुर के प्रमुख पद्मनाभ जगन्नाथ दास ने किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में स्वयंसेवकों और श्रद्धालुओं ने भाग लिया। भक्तों ने भजन-कीर्तन, आरती और हरिनाम संकीर्तन के माध्यम से भगवान जगन्नाथ से सुख, समृद्धि और विश्व कल्याण की प्रार्थना की।
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