बिहार के जमुई में 2500 करोड़ की लागत से बन रहे इथेनॉल प्लांट के सुचारु संचालन के लिए बिजली, सड़क और सुरक्षा की 3 मांगें रखी गईं। सीएम ने अधिकारियों को दिए सख्त निर्देश।
बिहार के जमुई जिले के उरवा में लगभग 2,500 करोड़ रुपये की लागत से आकार ले रहे एशिया के सबसे बड़े इथेनॉल प्लांट को लेकर राज्य भर में उम्मीदें आसमान पर हैं। हालांकि, इतने बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट को निर्बाध रूप से संचालित करने के लिए सिर्फ ढांचा खड़ा होना ही काफी नहीं होता, बल्कि मजबूत बुनियादी ढांचा सबसे पहली शर्त होती है। जब उरवा स्थित निर्माणाधीन ‘अंकुर बायोकेम इथेनॉल प्लांट’ का जायजा लेने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पहुंचे, तो कंपनी के डायरेक्टर महेंद्र शर्मा ने इलाके की तीन प्रमुख समस्याओं को उनके सामने प्रमुखता से रखा।

यदि इन बुनियादी जरूरतों पर समय रहते ध्यान न दिया गया तो अरबों रुपये का यह प्रोजेक्ट प्रभावित हो सकता है। कंपनी द्वारा सड़क, बिजली और सुरक्षा से जुड़ी उठाई गई इन तीन प्रमुख मांगों ने स्पष्ट कर दिया है कि एक पिछड़े इलाके को औद्योगिक हब में बदलने के लिए प्रशासनिक गति कितनी आवश्यक है।
70 किमी दूर से बिजली लाने की मजबूरी: स्थानीय पावर ग्रिड की मांग
किसी भी आधुनिक और विशालकाय फैक्ट्री का सुचारु संचालन उसकी निरंतर बिजली आपूर्ति पर निर्भर करता है। अंकुर बायोकेम प्लांट के डायरेक्टर महेंद्र शर्मा ने मुख्यमंत्री को अवगत कराया कि वर्तमान में जहां यह प्लांट बन रहा है, वहां से सबसे नजदीकी पावर ग्रिड की दूरी लगभग 70 किलोमीटर है। इतने बड़े इंडस्ट्रियल सेटअप के लिए 70 किमी दूर से बिजली खींचना न केवल तकनीकी रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण है, बल्कि इसमें बार-बार ट्रिपिंग और पावर कट का खतरा बना रहता है। उत्पादन के दौरान बिजली गुल होने से कंपनी को रोजाना लाखों रुपये का भारी नुकसान हो सकता है। इसी वजह से कंपनी प्रबंधन ने प्लांट के समीप ही एक नया स्थानीय पावर ग्रिड स्थापित करने की मांग की है।
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