सुप्रीम कोर्ट में बच्चों की सोशल मीडिया सुरक्षा पर सुनवाई हुई। नाबालिगों के डिजिटल अनुबंध, फर्जी जन्मतिथि और ऑनलाइन खतरों को लेकर चिंता जताई गई।
News Saga Desk
नई दिल्ली: फेसबुक, इंस्टाग्राम और स्नैपचैट जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बच्चों की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने नाबालिगों के सोशल मीडिया अकाउंट बनाने और डिजिटल टर्म्स ऑफ सर्विस से सहमति देने के कानूनी पहलुओं पर चिंता जताई। सुनवाई के दौरान बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए प्रभावी कानूनी उपायों की जरूरत का मुद्दा उठा।
मामले में केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी इस दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत पर सहमति जताई। बच्चों को ऑनलाइन ग्रूमिंग, साइबरबुलिंग, यौन शोषण और निजी डेटा के दुरुपयोग जैसे खतरों से बचाने के लिए मजबूत सुरक्षा व्यवस्था की मांग की गई है।
सुप्रीम कोर्ट में यह मामला एनजीओ ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अलायंस’ की ओर से दायर जनहित याचिका से जुड़ा है। याचिका में बच्चों की डिजिटल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी नियम और तकनीकी सुरक्षा उपाय लागू करने की मांग की गई है।
सुनवाई के दौरान डिजिटल टर्म्स ऑफ सर्विस का मुद्दा प्रमुखता से उठा। सोशल मीडिया अकाउंट बनाते समय यूजर्स को संबंधित प्लेटफॉर्म की शर्तों से सहमत होना पड़ता है। इस संदर्भ में अदालत में सवाल उठा कि जब नाबालिगों की अनुबंध करने की कानूनी क्षमता सीमित है, तो उनके द्वारा स्वीकार की जाने वाली डिजिटल शर्तों की वैधता को किस तरह देखा जाना चाहिए।
भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 11 के अनुसार, अनुबंध करने के लिए व्यक्ति का वयस्क होना जरूरी है। भारत में सामान्यतः 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को नाबालिग माना जाता है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस कानूनी पहलू पर ध्यान दिलाया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की शर्तों को स्वीकार करना एक अनुबंध से जुड़ा मामला है। ऐसे में नाबालिगों के सोशल मीडिया अकाउंट और डिजिटल सहमति की प्रक्रिया पर स्पष्ट कानूनी व्यवस्था की जरूरत का मुद्दा उठा।
हालांकि, इस चर्चा को सोशल मीडिया पर नाबालिगों के सभी अकाउंट स्वतः अवैध घोषित किए जाने या तत्काल प्रतिबंध लागू होने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके लिए अदालत के आदेश और लागू कानूनी प्रावधानों को देखना जरूरी होगा।
केवल गाइडलाइन नहीं, कानूनी सुरक्षा की मांग
याचिका में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए केवल दिशानिर्देश जारी करने के बजाय प्रभावी और लागू किए जा सकने वाले नियम बनाने पर जोर दिया गया है। इसमें सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़े नियमों के तहत सुरक्षा उपायों को मजबूत करने की मांग भी शामिल है।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी इस विषय पर ठोस कार्रवाई की आवश्यकता जताई। मामले में इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और कानून एवं न्याय मंत्रालय को भी पक्षकार बनाया गया है।
फिलहाल, किसी नए नियम के लागू होने या सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उम्र संबंधी प्रतिबंध तत्काल प्रभाव से लागू किए जाने की घोषणा को इस सुनवाई के आधार पर मान लेना सही नहीं होगा।
बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर कौन-कौन से खतरे?
याचिका में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल से जुड़े कई गंभीर जोखिमों का उल्लेख किया गया है। इनमें प्रमुख हैं:
- ऑनलाइन ग्रूमिंग: इंटरनेट पर बच्चों से संपर्क बनाकर उन्हें शोषण के जाल में फंसाने की कोशिश।
- साइबरबुलिंग: सोशल मीडिया पर धमकाना, अपमानित करना या लगातार परेशान करना।
- सेक्सटॉर्शन: निजी तस्वीरों या अन्य संवेदनशील सामग्री के जरिए ब्लैकमेल करना।
- यौन शोषण: ऑनलाइन संपर्क का दुरुपयोग कर बच्चों को शोषण का निशाना बनाना।
- निजी डेटा का दुरुपयोग: बच्चों की व्यक्तिगत जानकारी को अनुचित तरीके से एकत्र करना या इस्तेमाल करना।
याचिका में यह चिंता भी जताई गई है कि कुछ प्लेटफॉर्म पर अकाउंट बनाते समय यूजर द्वारा स्वयं दर्ज की गई जन्मतिथि पर निर्भरता के कारण उम्र की सही जांच करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
क्या बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर लगेगा प्रतिबंध?
याचिका का उद्देश्य बच्चों की इंटरनेट तक पहुंच पूरी तरह बंद करना नहीं बताया गया है। इसके बजाय, बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लागू करने की मांग की गई है।
इनमें माता-पिता या अभिभावक की सहमति, उम्र की बेहतर जांच और ऐसे तकनीकी सुरक्षा तंत्र शामिल हैं, जो निर्धारित उम्र से कम बच्चों को स्वतंत्र रूप से अकाउंट बनाने से रोक सकें।
हालांकि, अभिभावकों की सहमति और उम्र सत्यापन की व्यवस्था किस रूप में लागू होगी, यह संबंधित कानूनी नियमों और आगे होने वाली कार्रवाई पर निर्भर करेगा।
अब केंद्र सरकार और अदालत के अगले कदम पर नजर
सुप्रीम कोर्ट में उठा यह मामला बच्चों की डिजिटल सुरक्षा और सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल सामने लाता है। एक ओर बच्चों को इंटरनेट और डिजिटल सेवाओं तक सुरक्षित पहुंच देने की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर उनकी निजता, व्यक्तिगत जानकारी और ऑनलाइन गतिविधियों की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण है।
अब मामले में आगे की न्यायिक कार्यवाही और केंद्र सरकार की ओर से उठाए जाने वाले कदमों पर नजर रहेगी। किसी नए प्रतिबंध या नियम की स्थिति स्पष्ट होने के लिए अदालत के आदेश और सरकार की आधिकारिक घोषणा का इंतजार करना होगा।
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