सावन में मांस-मछली खाने से क्यों किया जाता है परहेज? जानिए धार्मिक और वैज्ञानिक कारण

NEWS SAGA DESK

सावन में मांसाहार से परहेज की परंपरा केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, मौसम और पर्यावरण संरक्षण से भी जुड़ी मानी जाती है।

हिंदू धर्म में सावन (श्रावण) का महीना भगवान शिव की आराधना, भक्ति और आध्यात्मिक साधना का सबसे पवित्र समय माना जाता है। इस पूरे महीने लाखों श्रद्धालु व्रत रखते हैं, शिव मंदिरों में जलाभिषेक करते हैं और सात्विक भोजन का पालन करते हैं। इसी दौरान सबसे अधिक पूछा जाने वाला सवाल यह होता है कि सावन में मांस-मछली क्यों नहीं खाई जाती?

इस परंपरा के पीछे धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ वैज्ञानिक, स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़े कई कारण भी बताए जाते हैं। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि मांसाहार करना या न करना व्यक्ति की धार्मिक आस्था, पारिवारिक परंपराओं और व्यक्तिगत पसंद पर निर्भर करता है।

धार्मिक मान्यता क्या कहती है?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन का महीना भगवान शिव को समर्पित होता है। इस दौरान श्रद्धालु पूजा-पाठ, जप, तप और व्रत के माध्यम से आध्यात्मिक साधना करते हैं।

हिंदू परंपरा में भोजन को तीन श्रेणियों—सात्विक, राजसिक और तामसिक—में बांटा गया है। मांस और मछली को सामान्यतः तामसिक भोजन माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि तामसिक भोजन मन को चंचल या अशांत कर सकता है, जबकि सात्विक भोजन मन की शांति, संयम और एकाग्रता बढ़ाने में सहायक माना जाता है।

इसी कारण कई श्रद्धालु सावन के पूरे महीने मांसाहार का त्याग कर सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं।

वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संबंधी कारण

सावन का महीना वर्षा ऋतु के दौरान आता है। इस समय वातावरण में नमी अधिक होने के कारण बैक्टीरिया, फफूंद और अन्य सूक्ष्म जीव तेजी से पनप सकते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस मौसम में भोजन के जल्दी खराब होने और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। मांस और मछली जैसे खाद्य पदार्थ यदि सही तरीके से संग्रहित या पकाए न जाएं तो फूड पॉइजनिंग और संक्रमण का जोखिम बढ़ सकता है।

इसके अलावा, मानसून के दौरान पाचन तंत्र भी अपेक्षाकृत संवेदनशील माना जाता है। इसलिए इस मौसम में हल्का, ताजा और आसानी से पचने वाला भोजन खाने की सलाह दी जाती है।

पर्यावरण और जैव विविधता से भी जुड़ी है परंपरा

कई विशेषज्ञ मानते हैं कि सावन में मांस-मछली से परहेज की परंपरा का संबंध पर्यावरण संरक्षण से भी हो सकता है।

भारत के कई हिस्सों में वर्षा ऋतु मछलियों और अन्य जलीय जीवों का प्रजनन काल होती है। ऐसे समय में मछली पकड़ने में कमी आने से उनकी संख्या बढ़ने और प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है।

इसी तरह, प्रकृति और जीव-जंतुओं के संरक्षण की भावना को भी इस परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।

इसे भी देखें:-SIR पर झारखंड कांग्रेस की बड़ी मांग! 15 दिन और बढ़े सत्यापन की तारीख, CEO ने क्या कहा?

धार्मिक दृष्टि से कई लोग सावन में मांसाहार से परहेज करते हैं, लेकिन यह सभी के लिए कानूनी या अनिवार्य नियम नहीं है।

यह पूरी तरह व्यक्ति की धार्मिक आस्था, पारिवारिक परंपरा, सांस्कृतिक मान्यताओं और खान-पान की व्यक्तिगत पसंद पर निर्भर करता है। अलग-अलग समुदायों और क्षेत्रों में इस विषय पर अलग-अलग परंपराएं देखने को मिलती हैं।

Read More News

पलामू इंजीनियरिंग कॉलेज के गर्ल्स हॉस्टल मेस में बड़ी गड़बड़ी, एक्सपायर खाद्य पदार्थ जब्त

पलामू इंजीनियरिंग कॉलेज गर्ल्स हॉस्टल मेस की जांच में एक्सपायर व मिसब्रांडेड खाद्य पदार्थ मिले।...

झारखंड के दुमका के रेशम किसान शम्भूनाथ देहरी को राष्ट्रीय सम्मान, केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने किया पुरस्कृत

दुमका के रेशम किसान शम्भूनाथ देहरी को केंद्रीय रेशम बोर्ड के 77वें स्थापना दिवस पर ‘प्राइवेट...

बिहार विधान परिषद चुनाव: जन सुराज ने 5 उम्मीदवारों के नाम घोषित किए, प्रशांत किशोर का शिक्षकों से 3 बड़े वादे

बिहार विधान परिषद चुनाव में जन सुराज ने 5 उम्मीदवारों के नाम घोषित किए। प्रशांत किशोर ने शिक्षकों...

Read More