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उत्तर कुंजी और रिस्पॉन्स शीट नहीं मिलने से आपत्ति दर्ज कराने का अवसर गंवाने का दावा, झारखंड हाई कोर्ट ने आयोग से मांगा विस्तृत स्पष्टीकरण
JSSC Secondary Teacher Recruitment Caseमाध्यमिक आचार्य नियुक्ति प्रक्रिया (विज्ञापन संख्या-02/2025) से जुड़े विवाद ने अब न्यायिक मोड़ ले लिया है। झारखंड उच्च न्यायालय ने इस मामले में झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) से जवाब तलब करते हुए विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा है। अभ्यर्थियों द्वारा नियुक्ति प्रक्रिया में तकनीकी खामियों और अनियमितताओं के आरोप लगाए जाने के बाद न्यायालय ने मामले को गंभीरता से लिया है।
JSSC Newsइस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत में हुई। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से कई महत्वपूर्ण बिंदु अदालत के समक्ष रखे गए, जिनमें परीक्षा के बाद उत्तर कुंजी (आंसर-की) और रिस्पॉन्स शीट उपलब्ध नहीं कराए जाने का मुद्दा प्रमुख रहा। अभ्यर्थियों का कहना है कि आयोग की वेबसाइट पर लॉगिन करने के बावजूद वे अपनी उत्तर कुंजी और रिस्पॉन्स शीट नहीं देख सके, जिससे उन्हें चयन प्रक्रिया में नुकसान उठाना पड़ा।
JSSC Secondary Teacher Recruitment Case सुनवाई के दौरान न्यायालय ने झारखंड कर्मचारी चयन आयोग को निर्देश दिया कि वह मामले से संबंधित सभी आवश्यक जानकारियां और स्पष्ट निर्देश प्राप्त कर अगली सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष प्रस्तुत करे। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 30 जून की तिथि निर्धारित की है।

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि परीक्षा के परिणाम और उत्तर कुंजी जारी होने के बाद जब उन्होंने आयोग के पोर्टल पर लॉगिन करने का प्रयास किया, तो उन्हें बार-बार “यूजर डज नॉट एग्जिस्ट” का संदेश दिखाई देता रहा। इस तकनीकी समस्या के कारण वे अपनी उत्तर पुस्तिका से संबंधित विवरण नहीं देख सके। अभ्यर्थियों का कहना है कि यह समस्या केवल कुछ लोगों तक सीमित नहीं थी, बल्कि बड़ी संख्या में परीक्षार्थी इससे प्रभावित हुए थे।
अभ्यर्थियों ने अदालत को बताया कि उत्तर कुंजी और रिस्पॉन्स शीट उपलब्ध नहीं होने के कारण वे निर्धारित समय सीमा के भीतर किसी भी प्रश्न या उत्तर पर आपत्ति दर्ज नहीं करा सके। उनका तर्क है कि आपत्ति दर्ज कराना प्रत्येक अभ्यर्थी का वैधानिक अधिकार है और आयोग की तकनीकी विफलता के कारण वे इस अधिकार से वंचित रह गए। इससे उनकी मेरिट और अंतिम चयन पर भी प्रभाव पड़ सकता है।
याचिका में यह भी कहा गया कि तकनीकी समस्याओं के चलते कई अभ्यर्थियों को दस्तावेज सत्यापन (डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन) की प्रक्रिया में शामिल होने का अवसर भी नहीं मिला। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, यदि उन्हें समय पर उत्तर कुंजी और रिस्पॉन्स शीट उपलब्ध कराई जाती और आपत्तियां दर्ज करने का मौका मिलता, तो चयन प्रक्रिया में उनकी स्थिति बेहतर हो सकती थी। ऐसे में उन्हें चयन के अगले चरण से बाहर कर देना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस पहलू पर विशेष चिंता जताई कि यदि वास्तव में बड़ी संख्या में अभ्यर्थी तकनीकी खामियों के कारण प्रभावित हुए हैं, तो यह पूरी चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है। न्यायालय ने आयोग से यह स्पष्ट करने को कहा है कि आखिर किन परिस्थितियों में अभ्यर्थियों को उनकी उत्तर कुंजी और रिस्पॉन्स शीट उपलब्ध नहीं हो सकी तथा इस समस्या के समाधान के लिए आयोग ने क्या कदम उठाए।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अदालत को यह प्रतीत होता है कि तकनीकी त्रुटियों के कारण अभ्यर्थियों के अधिकार प्रभावित हुए हैं, तो आयोग को आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाने के निर्देश दिए जा सकते हैं। इससे प्रभावित अभ्यर्थियों को राहत मिलने की संभावना भी बन सकती है।
इसे भी देखें :https://youtube.com/shorts/18o6wZuGV80?si=CIHYqyvd26H8-qYy
माध्यमिक आचार्य नियुक्ति प्रक्रिया राज्य में लंबे समय से चर्चा का विषय बनी हुई है, क्योंकि हजारों अभ्यर्थी इस भर्ती के माध्यम से शिक्षक बनने की उम्मीद लगाए बैठे हैं। ऐसे में चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करना आयोग की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मानी जा रही है।
अब सभी की निगाहें 30 जून को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जब झारखंड कर्मचारी चयन आयोग अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखेगा। यह सुनवाई न केवल प्रभावित अभ्यर्थियों के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण होगी, बल्कि राज्य की भर्ती प्रक्रियाओं में तकनीकी व्यवस्था और पारदर्शिता को लेकर भी एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित कर सकती है।
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