झारखंड के पारंपरिक वाद्य यंत्र मांदर को भौगोलिक संकेतक (GI Tag) मिल गया है। जानिए 5 साल तक चले इस प्रयास, स्थानीय कारीगरों को मिलने वाले लाभ और इसकी पूरी कहानी।
झारखंड की समृद्ध आदिवासी संस्कृति, कला और धरोहर के इतिहास में एक नया और स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया है। राज्य की सांस्कृतिक पहचान के सबसे प्रमुख प्रतीकों में शामिल पारंपरिक वाद्य यंत्र ‘मांदर’ (Mandar) को आधिकारिक तौर पर भौगोलिक संकेतक यानी जीआई (GI) टैग प्रदान कर दिया गया है। भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री ने गुमला जिला प्रशासन की ओर से पेश किए गए दावे और प्रमाणों को स्वीकार करते हुए मांदर को यह विशिष्ट दर्जा दिया है। लगभग पांच वर्षों तक चली जटिल कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं, व्यापक प्रचार-प्रसार तथा विभिन्न चुनौतियों के बाद मिली यह सफलता राज्य की सांस्कृतिक विरासत के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।

गुमला से हुई थी ऐतिहासिक पहल
मांदर को वैश्विक और राष्ट्रीय पटल पर जीआई दर्जा दिलाने की मुहिम लगभग पांच वर्ष पूर्व शुरू हुई थी। इस मुहिम को प्रशासनिक स्तर पर सबसे बड़ा बल गुमला जिले से मिला। गुमला में 28 जुलाई 2023 से 27 मई 2025 तक उपायुक्त (DC) के रूप में कार्यरत रहे आईएएस अधिकारी कर्ण सत्यार्थी ने मांदर की निर्माण कला, इसके पीछे छिपे स्थानीय कारीगरों के हुनर और झारखंडी जनजीवन में इसके महत्व को रेखांकित करते हुए जीआई टैग की प्रक्रिया को गति दी थी।
इसके साथ ही 1998 बैच की झारखंड कैडर की वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हिमानी पांडे ने भी इस पूरी प्रक्रिया में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्तमान में केंद्र सरकार के उद्योग विभाग में अतिरिक्त सचिव के पद पर तैनात हिमानी पांडे ने विभिन्न केंद्रीय व राज्य स्तरीय विभागों के बीच समन्वय स्थापित कर फाइलों और दावों को मजबूती से आगे बढ़ाने में सहयोग किया।
आदिवासी समाज और संस्कृति की धड़कन है मांदर
मांदर महज मिट्टी और चमड़े से बना एक संगीतमय वाद्य यंत्र नहीं है, बल्कि यह झारखंड के आदिवासी समाज की आत्मा और उनकी सामुदायिक जीवनशैली का जीवंत हिस्सा है। राज्य के प्रमुख लोक पर्वों जैसे ‘करम’, ‘सरहुल’, ‘जितिया’ और ‘माघे’ के दौरान मांदर की गूंजती थाप के बिना कोई भी अनुष्ठान या नृत्य अधूरा माना जाता है।
सदियों से पीढ़ियों दर पीढ़ियों हस्तांतरित होती आ रही इस परंपरा में मांदर की लयबद्ध ताल पर पूरा गाँव एक साथ थिरकता है। जीआई टैग आवेदन में मांदर के इसी गहरे सामाजिक-सांस्कृतिक जुड़ाव और इसके अनूठे ध्वनि विज्ञान को प्रमुख आधार बनाया गया था।
इस जीआई टैग का सबसे बड़ा फायदा गुमला और आसपास के क्षेत्रों में पीढ़ियों से मांदर बना रहे स्थानीय कारीगरों व कुम्हारों को होगा:
- ब्रांड वैल्यू में बढ़ोतरी: अब कोई भी अन्य संस्था या व्यक्ति बिना प्रामाणिकता के नकली या मशीन-मेड मांदर को ‘झारखंडी मांदर’ के नाम से नहीं बेच सकेगा।
- आर्थिक मजबूती: जीआई टैग मिलने से कारीगरों को उनके उत्पाद का उचित मूल्य मिलेगा और बिचौलियों का शोषण समाप्त होगा।
- अंतर्राष्ट्रीय बाजार: मांदर को अब राष्ट्रीय के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय हस्तशिल्प बाजारों में एक प्रामाणिक जीआई उत्पाद के रूप में प्रदर्शित और निर्यात किया जा सकेगा।
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