बॉम्बे हाईकोर्ट ने ‘बालिका वधू’ फेम प्रत्युषा बनर्जी के बॉयफ्रेंड राहुल राज सिंह को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों से बरी कर दिया है। 1 अप्रैल 2016 की फोन कॉल रिकॉर्डिंग के आधार पर कोर्ट ने यह फैसला सुनाया। पढ़ें पूरी खबर।
टेलीविजन की दुनिया के सबसे चर्चित और विवादित मामलों में से एक ‘बालिका वधू’ (Balika Vadhu) फेम दिवंगत अभिनेत्री प्रत्युषा बनर्जी (Pratyusha Banerjee) सुसाइड केस में 8 साल बाद बड़ा कानूनी मोड़ आया है। बॉम्बे हाईकोर्ट (Bombay High Court) ने प्रत्युषा के तत्कालीन लिव-इन पार्टनर और अभिनेता-निर्माता राहुल राज सिंह (Rahul Raj Singh) को आत्महत्या के लिए उकसाने (Abetment to Suicide) के सभी आरोपों से पूरी तरह मुक्त (Discharge) कर दिया है।

अदालत के इस फैसले का सीधा मतलब यह है कि राहुल राज सिंह को अब इस मामले में किसी भी तरह के आपराधिक मुकदमे (Trial) का सामना नहीं करना पड़ेगा। झारखंड के जमशेदपुर की रहने वालीं प्रत्युषा बनर्जी 1 अप्रैल 2016 को मुंबई के गोरेगांव स्थित अपने फ्लैट में पंखे से लटकी पाई गई थीं, जिसके बाद इस मामले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था।
आखिरी फोन कॉल रिकॉर्डिंग बनी बेगुनाही का सबसे बड़ा सबूत
मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति शिवकुमार डिगे की एकल पीठ ने 1 अप्रैल 2016 को प्रत्युषा बनर्जी और राहुल राज सिंह के बीच हुई अंतिम फोन बातचीत (Last Call Recording) को सबसे अहम और निर्णायक सबूत माना।

कॉल रिकॉर्डिंग के ट्रांसक्रिप्ट से यह स्पष्ट हुआ कि राहुल राज सिंह, प्रत्युषा को कोई भी जानलेवा या आत्मघाती कदम उठाने से लगातार रोक रहे थे। कॉल के दौरान राहुल ने प्रत्युषा से यह भी कहा था कि वह अपनी गाड़ी मोड़ चुके हैं और तुरंत उनके पास वापस आ रहे हैं। इस बातचीत के आधार पर कोर्ट ने माना कि राहुल घटना के वक्त प्रत्युषा को संभालने और बचाने की कोशिश कर रहे थे, न कि उन्हें सुसाइड के लिए उकसा रहे थे।
राहुल राज सिंह के वरिष्ठ वकीलों (आबाद पोंडा और श्रेयांश मिठारे) ने अदालत में मजबूत पक्ष रखते हुए कहा कि प्रत्युषा उस समय अत्यधिक मानसिक तनाव (Stress) से गुजर रही थीं। फोन पर हुई आखिरी बातचीत में उन्होंने अपनी इस स्थिति के लिए अपने माता-पिता समेत कई अन्य लोगों को भी जिम्मेदार ठहराया था।
बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि घटना के बाद बिना किसी सुसाइड नोट के पुलिस ने जल्दबाजी में राहुल के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज की थी। ऐसे में सालों बाद भी उन पर मुकदमा चलाना केवल न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग (Abuse of Judicial Process) होगा। अदालत ने बचाव पक्ष की इन सभी दलीलों को स्वीकार करते हुए राहुल को बरी कर दिया।
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